मिला जनादेश : मोदी फिर प्रधानमंत्री

यतीन्द्र अत्रे

4 जून के परिणामों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी अगले 5 वर्षों के लिए फिर देश के प्रधानमंत्री होंगे। हालांकि अनुमानों से परे इस बार 64 करोड़ मतदाताओं ने ही देश का भविष्य 5 वर्षों के लिए तय किया है। जहां एग्ज़िट पोल में भारतीय जनता पार्टी की जीत 300 पार दिखाई गई थी वहीं बीजेपी को 240 सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। जबकि इसके उलट इंडिया गठबंधन ने अपनी स्थिति मजबूत की है। अब यहां गौर करने वाली बात यह है कि खुशी इतनी है कि जैसे उन्होंने सरकार बना ली हो। जबकि 1962 के बाद ऐसी स्थिति निर्मित हुई है जिसमे वे दिन लौट कर आए हैं जब किसी प्रधानमंत्री ने तीसरी बार शपथ ली है। यह आश्चर्य किंतु सत्य है कि लोकसभा चुनाव 2024 को मतदाताओं ने कुछ अलग ही रंग दिया, जहां एक ओर विश्व में तीसरी इकॉनामी के रूप में भारत की पहचान,धारा 370,सीएए जैसे विषय प्रभावी थे वहां स्थानीय समस्याएं हावी होने लगी। परिणाम यह हुआ की खिंची डोर टूटती नज़र आई। क्षेत्रीय दलों ने इसका भरपूर लाभ लिया और दो वर्गों में विभाजित मतदाताओं में से वे एक वर्ग को मोदी जी की संभावनाओं के विरुद्ध खड़ा करने में सफल हो गए,वहीं खुशी कुछ इस तरह मनाई जा रही है जैसे उन्होंने महासंग्राम जीता है। चुनावी पंडितों के भी सुर बदलने लगे अब जब तस्वीर धुंधली नहीं रही, फिर भी जानकारों द्वारा पिछली गठबंधन सरकारों के इतिहास खंगाले गए। पक्षधर यह भूल रहे हैं कि 240 सीटों के गठजोड़ के साथ भाजपा सरकार की मजबूत कड़ी है। यह सिद्ध करता है कि एक बड़ा वर्ग मोदी जी के साथ अभी भी खड़ा है जो देश का विकास चाहता है, जिन्हें भ्रमित करना अभी दिल्ली दूर है जैसा है। परिणामों को देखते हुए  यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि गठबंधन सरकारों पर भरोसा नहीं जताया जा सकता है। राजनीतिक दलों के अपने निहित स्वार्थ होते हैं और उसके चलते ही वे अपनी स्थिति को भांपते हुए सरकार को समर्थन देते हैं। निहित स्वार्थ से यहां यह कतई तात्पर्य नहीं होना चाहिए कि वे निजी स्वार्थ होंगे, अपितु वे अपने क्षेत्र का विकास चाहेंगे। किंतु अकेले दम पर तो वे सरकार बना नहीं सकते लेकिन किसी दूसरे बड़े दल को समर्थन देते हुए अपने क्षेत्र की जनता का भरोसा जरूर जीतना चाहते हैं, क्योंकि यही भरोसा उनका भविष्य तय करता है। अब यह कहना भी गलत नहीं होगा कि एनडीए सरकार के किंगमेकर कहे जाने वाले चंद्रबाबू नायडू और नीतीश कुमार के भविष्य में मोदी जी का साथ छोड़ने के कोई कारण नहीं दिखाई देते हैं। बल्कि नज़र यह आ रहा है कि आंध्र प्रदेश में एनडीए गठबंधन ने ही जीत दर्ज कराई है, जिसमें बीजेपी, जेएसपी के साथ टीडीपी मजबूत हुई है। दूसरा जैसे कि मैंने पहले ही कहा है कि क्षेत्रीय दल अपने क्षेत्र का विकास चाहते हैं, इस हेतु उन्हें तकनीकी एवं आर्थिक सहायता हेतु केंद्र सरकार की आवश्यकता होगी। सुनने में यह भी आ रहा है कि चंद्रबाबू पिछले कई वर्षों से अमरावती को राजधानी के रूप में विकसित करने के पक्षधर रहे हैं, वहीं नीतीश यदि एनडीए का दामन छोड़ते हैं तब उन्हें पटना में भाजपा-जदयू गठबंधन सरकार को भी तोड़ना होगा। उन्हें इस बात का भी एहसास होगा कि बिहार के विकास के लिए मोदी जी बेहतर विकल्प होंगे। जनादेश के अनुसार जहां विपक्ष का मोदी जी को सत्ता से बेदखल करने की उम्मीदों को करारा झटका लगा है जिसके लिए वे एकजुट हुए थे, दूसरी ओर मतदाताओं ने सत्ता पक्ष के वर्चस्व की ओर बढ़ते विश्वास को भी धूमिल किया है।  
मो.: 9425004536

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *