भोपाल। उर्दू के प्रसिद्ध शायर और पद्मश्री सम्मान से अलंकृत डॉ. बशीर बद्र का 28 मई 2026 को दोपहर 12:35 बजे निधन हो गया। उनके निधन की ख़बर से ईद के दिन भोपाल के साहित्यिक जगत में शोक का माहौल है। डॉ. बशीर बद्र को 28 मई को रात 8:00 बजे बड़े बाग़ क़ब्रिस्तान में सुपुर्द-ए-ख़ाक किया गया।
29 मई 2026 दोपहर 3:00 बजे मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी कार्यालय में बशीर बद्र साहब को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए एक शोकसभा आयोजित की गई, जिसमें बड़ी संख्या में शायरों, साहित्यकारों और बद्र साहब के चाहने वालो ने सहभागिता की।
संस्कृति विभाग की ओर से श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए श्री श्री राम तिवारी ने कहा कि वे एक महान शायर थे। उनकी साहित्यिक विरासत को आगे बढ़ाना हमारी ज़िम्मेदारी है। उन्होंने कहा कि जो कारवां वे लेकर चले थे, उसे आगे ले जाना हम सबका दायित्व है।
श्री हेमंत मुक्तिबोध ने कहा कि बशीर बद्र ने जो भी लिखा, उसका हर शब्द किसी न किसी संदेश से भरा होता था। उन्होंने कहा कि उनकी शायरी में “सत्यम्-शिवम्-सुंदरम्” का प्रतिबिंब दिखाई देता है और उनकी काव्य-शैली अत्यंत विशिष्ट थी।
उर्दू अकादमी की निदेशक डॉ. नुसरत मेहदी ने डॉ. बशीर बद्र को याद करते हुए कहा कि वे पूर्व प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी जी के भी बहुत प्रिय थे। बाजपेयी जी उनको अपने साथ दिल्ली से लाहौर बस यात्रा में भी लेकर गए थे। बद्र साहब केवल देश में ही नहीं बल्कि विदेशों में भी बेहद लोकप्रिय थे। भारत सरकार ने उन्हें वर्ष 1999 में पद्मश्री सम्मान से नवाज़ा था। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी ने उन्हें वर्ष 1995-96 में “मीर तक़ी मीर अखिल भारतीय सम्मान” से सम्मानित किया। वे मई 2005 से 3 सितंबर 2011 तक मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी के अध्यक्ष रहे। इसके अतिरिक्त भी उन्हें अनेक राष्ट्रीय और प्रादेशिक पुरस्कारों से सम्मानित किया गया। उनकी अनेक पुस्तकें भी प्रकाशित हुईं और व्यापक रूप से सराही गईं। डॉ. नुसरत मेहदी ने आगे कहा कि उन्हें कभी यह एहसास नहीं था कि एक दिन उनकी अनुपस्थिति में यह शेर पढ़ना पड़ेगा।
“उजाले अपनी यादों के हमारे साथ रहने दो,
न जाने किस गली में ज़िंदगी की शाम हो जाए।”
डॉ विकास दवे ने कहा कि बशीर बद्र ने अपना पूरा जीवन शायरी को समर्पित कर दिया और उन्हें लोगों का जो प्रेम मिला, वह बहुत कम लोगों को नसीब होता है। उन्होंने कहा कि यह किसी भी पुरस्कार से बढ़कर है।
प्रोफ़ेसर नौमान ख़ान ने कहा कि उनके अनेक शेर लोकोक्तियों की तरह प्रसिद्ध हो चुके हैं और आम लोगों की ज़ुबान पर रहते हैं। उन्होंने कहा कि वे वास्तविक अर्थों में एक अंतर्राष्ट्रीय शायर थे, जिनकी रचनाएँ इतिहास और लोगों की स्मृतियों में सदैव जीवित रहेंगी।
इक़बाल मसूद ने भावुक होकर कहा कि वे इन्हीं दीवारों और दरों में उनके साथ रहे हैं और आज भी उनकी आवाज़ कानों में गूंजती है। उन्होंने कहा कि बशीर बद्र केवल शायर ही नहीं थे, बल्कि उन्होंने गद्य साहित्य में भी महत्वपूर्ण कार्य किया।
प्रसिद्ध शायर आलोक श्रीवास्तव ने श्रद्धांजलि देते हुए कहा कि जिन्होंने स्वयं बोलना सिखाया हो, उनके बारे में बोलना कितना कठिन होता है। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें गर्व है कि उन्होंने बशीर बद्र से बहुत कुछ सीखा।
श्री जीवन एस रजक ने कहा कि वे कॉलेज के दिनों से उनके शेर सुनते आ रहे हैं। उनकी भाषा इतनी सरल और सहज थी कि हर व्यक्ति उसे समझ सकता था।
डॉ. आज़म ने अपना आलेख प्रस्तुत करते हुए कहा कि उर्दू ग़ज़ल का बेताज बादशाह हमसे बिछड़कर अनंत यात्रा पर निकल गया है। उनके निधन से उर्दू ग़ज़ल का एक स्वर्णिम अध्याय और मोहब्बत की एक रौशन किताब पूर्ण हो गई।
बद्र वास्ती ने दिवंगत आत्मा की मग़फ़िरत की दुआ करते हुए कहा कि उन्होंने बशीर बद्र के चरणों में बैठकर बहुत कुछ सीखा। उन्होंने कहा कि समय के साथ उनकी महत्ता और बढ़ती जाएगी। उन्होंने सभी से उनके दिखाए रास्ते पर चलने का आग्रह किया और उन्हें इस दौर का आख़िरी बड़ा शायर बताया।
मलिक नवेद ने बशीर बद्र को याद करते हुए यह शेर पढ़ा—
“जिस दिन से चला हूँ मिरी मंज़िल पे नज़र है,
आँखों ने कभी मील का पत्थर नहीं देखा।”
इसके अतिरिक्त महमूद मलिक, महेश सक्सेना, मनीष बादल, सैयद आबिद हुसैन, तसनीम राजा, फ़ाज़िल फ़ैज़ और शहंशाह ने भी डॉ. बशीर बद्र को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनके साथ बिताए पलों को याद किया।
















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