महेश अग्रवाल
संविधान – राष्ट्र की आत्मा का दृष्टिदर्शी ग्रंथ* जब हम 26 नवंबर को संविधान दिवस मनाते हैं, तब यह केवल एक औपचारिक राष्ट्रीय आयोजन नहीं होता। यह वह ऐतिहासिक दिवस है जब भारत ने स्वयं को आधुनिक विश्व में एक व्यवस्थित, मूल्यसम्पन्न और नैतिक राष्ट्र के रूप में स्थापित किया। इस दिन हमारे देश ने भारतीय संविधान को अंगीकार किया ऐसा संविधान जो गहरी भारतीय संस्कृति, अध्यात्म, योग दर्शन, धर्मनिरपेक्षता, मानवता और न्याय के शाश्वत सिद्धांतों पर आधारित है। भारतीय संविधान आधुनिकता और प्राचीनता का अद्भुत संगम है। यह वह आध्यात्मिक दस्तावेज़ है जो कहता है अधिकारों को अर्जित करने से पहले कर्तव्यों का अभ्यास आवश्यक है और कर्तव्यों का पालन ही राष्ट्र निर्माण का बीज है।
*भारतीय संविधान का आध्यात्मिक और सांस्कृतिक आधार* कई लोग संविधान को केवल विधि और शासन का ढांचा मानते हैं, परंतु सत्य यह है कि इसका मूल दर्शन भारतीय अध्यात्म में हजारों वर्ष से विद्यमान है। धर्म की भारतीय व्याख्या – कर्तव्य, व्यवस्था और समरसता। भारतीय दर्शन में धर्म का अर्थ किसी मज़हब से नहीं, बल्कि कर्तव्य, सत्य, नियम और न्याय से है।इसी वजह से हमारा संविधान हर नागरिक को अधिकार देता है, परंतु साथ ही यह अपेक्षा भी रखता है कि वह सत्यवादी, न्यायप्रिय, कर्तव्यनिष्ठ, और समाजहितकारी बने। उपनिषदों और गीता का प्रभाव – भारतीय संविधान की बुनियाद में यह आध्यात्मिक भाव स्पष्ट दिखाई देता है – सर्वे भवन्तु सुखिनः – सबके सुख का मार्ग खोजो। न हि ज्ञानेन सदृशम् – ज्ञान से श्रेष्ठ कुछ नहीं। नित्यं युक्तः उपासते – अनुशासन ही उत्कर्ष का मार्ग है। डॉ. भीमराव आम्बेडकर स्वयं कहते थे कि भारत का संविधान न्याय और करुणा आधारित ग्रंथ है। बौद्ध, जैन, वैदिक और सूफ़ी विचारों का समन्वय – भारत की समन्वयकारी संस्कृति इस संविधान में झलकती है – वह किसी को अलग नहीं करती, सबको जोड़ती है। यही तो योग भी कहता है – युज् धातु मतलब जोड़ना, मिलाना, एक करना।
*संविधान और योग – आंतरिक व बाह्य संतुलन का विज्ञान* संविधान और योग – दोनों ही मनुष्य को अनुशासन, कर्तव्य, संतुलन और आत्म-जागरूकता की ओर ले जाते हैं। अंतर यह है कि योग व्यक्ति के मन, बुद्धि और चेतना को संतुलित करता है। संविधान समाज, शासन और राष्ट्र के व्यवहार, अधिकार एवं कर्तव्यों को संतुलित करता है। योग भीतरी अनुशासन देता है – योग कहता है – मनः प्रसादेन सुखम्। जब मन प्रसन्न और संतुलित हो, तब जीवन सधा रहता है। संविधान बाहरी व्यवस्था देता है। संविधान कहता है – न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व – ये चार स्तंभ जीवन को स्थिर करते हैं। योग मतलब आंतरिक व्यवस्था। संविधान मतलब बाहरी व्यवस्था – दोनों मिलकर मनुष्य को पूर्ण बनाते हैं।
*अधिकार – विकास का उजाला*
संविधान हमें कई महत्वपूर्ण अधिकार देता है – अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता, समानता का अधिकार, शिक्षा का अधिकार, संवैधानिक उपचार का अधिकार। योग कहता है – मनुष्य का वास्तविक अधिकार है – स्वतंत्र विचार, स्वस्थ शरीर और शांत मन। संविधान का हर अधिकार व्यक्तित्व निर्माण का मार्ग खोलता है।
*कर्तव्य – राष्ट्रयोग की सच्ची साधना* आज संविधान दिवस का सबसे बड़ा संदेश यही है – कर्तव्य ही अधिकारों की सुरक्षा करते हैं। योग दर्शन में यम और नियम 10 मुख्य अनुशासन बताए गए हैं – सत्य, अहिंसा, अस्तेय, शौच, संतोष, तप, ब्रह्मचर्य, ईश्वर प्राणिधान – ये सब मूलतः कर्तव्यों के रूप हैं। भारतीय संविधान भी नागरिकों से निम्न कर्तव्य अपेक्षित करता है – राष्ट्र की एकता बनाए रखना, देश की रक्षा करना, सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा, महिलाओं का सम्मान, वैज्ञानिक सोच, पर्यावरण की रक्षा, संस्कृति का सम्मान, शिक्षा को बढ़ावा देना – जब नागरिक अपने कर्तव्यों को अपनाते हैं, तभी राष्ट्र योगमय राष्ट्र बनता है – यानी एकजुट, अनुशासित और समरस।
*संविधान और सामाजिक सद्भभाव – योग की मैत्री भावना* योग कहता है – मैत्री, करुणा, मुदिता और उपेक्षा ये चार भाव समाज को सुंदर बनाते हैं। संविधान भी यही कहता है किसी भी जाति, धर्म, भाषा, रंग या क्षेत्र के आधार पर भेदभाव न करो। योग और संविधान – दोनो भारतीय समाज को समान, शांत, सशक्त बनाते हैं।
पर्यावरण की रक्षा – आधुनिक कर्तव्य, प्राचीन योग का संदेश
संविधान नागरिकों को पर्यावरण संरक्षण का कर्तव्य देता है। योग प्रकृति को दैवीय ऊर्जा मानता है। प्राणायाम का प्रत्येक श्वास हमें याद दिलाता है – प्रकृति ही प्राण है। अगर पर्यावरण न रहे तो जीवन, स्वास्थ्य, अर्थव्यवस्था, संस्कृति- सब कुछ समाप्त हो जाएगा। इसलिए संविधान दिवस पर पर्यावरण चेतना फैलाना भी योगीय कर्तव्य है।
*युवा पीढ़ी और संविधान – भविष्य का आधार* युवा भारत की ऊर्जा हैं। योग गुरु के रूप में मेरा संदेश – युवा शक्ति को चाहिए संविधान पढ़ना और समझना, डिजिटल सत्यनिष्ठा अपनाना, नशामुक्त समाज बनाना, फिटनेस व योग को जीवन में उतारना, वैज्ञानिक चिंतन को आगे बढ़ाना, सामाजिक न्याय के पक्ष में खड़ा होना, युवाओं की चेतना जागृत हो तो भारत शिखर पर पहुँचता है।
*संविधान में स्त्री पुरुष समानता – योग की संतुलन दृष्टि* संविधान महिलाओं को समान अधिकार देता है। यह वही दृष्टि है जिसे योग इड़ा पिंगला के संतुलन के रूप में देखता है। स्त्री और पुरुष दोनों प्रकृति के दो पंख हैं। समानता के बिना समाज उड़ नहीं सकता। संविधान कहता है समानता जन्मसिद्ध अधिकार है। योग कहता है शक्ति और शिव दोनों समान हैं, तभी सृष्टि चलती है।
*भारत – केवल लोकतंत्र नहीं, धर्म-लोकतंत्र है* भारत का लोकतंत्र पश्चिमी देशों की नकल नहीं है। यह हजारों वर्षों पुरानी सभा, समिति, पंचायत और जनस्वराज की परंपरा से निकला है। महर्षि पाणिनि, कौटिल्य, बुद्ध, महावीर, वेद, उपनिषद – सबने जनसहभागिता पर बल दिया। इसीलिए हमारा संविधान भारतीयता और आधुनिकता का समन्वय है।
*संविधान – राष्ट्र – योग का विराट रूप* योग केवल आसन नहीं। योग है – अनुशासन, सत्य, संतुलन, करुणा, कर्तव्य, एकता, शांति। जब इसे राष्ट्र पर लागू करते हैं तो यही बन जाता है-संविधान। इसलिए संविधान दिवस योगियों के लिए विशेष दिवस है-क्योंकि यह आंतरिक और बाह्य दोनों तरह की स्वतंत्रता का उत्सव है।
*भारत-चेतना, चरित्र और संस्कृति का महाद्वीप* संविधान दिवस हमें यह स्मरण कराता है कि – संविधान की शक्ति कानून में नहीं, चरित्र में है। राष्ट्र की शक्ति संपत्ति में नहीं, समरसता में है। लोकतंत्र की शक्ति चुनाव में नहीं, शिक्षा और जागरूकता में है। समाज की शक्ति अधिकारों में नहीं, कर्तव्यों में है। अंततः मेरे शब्द – संविधान हमें अधिकार देता है, योग हमें विवेक देता है। अधिकार और विवेक जब एक हो जाते हैं, तब राष्ट्र विश्वगुरु बन जाता है।
लेखक के ये अपने विचार हैं।

















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