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साहित्य, संस्कार एवं राष्ट्रबोध” विषय वस्तुतः भारतीय सांस्कृतिक चेतना के त्रिवेणी-संगम का प्रतीक : आलोक संजर”

भोपाल : मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद्, संस्कृति विभाग द्वारा “क़लम की रोशनी” श्रृंखला के अंतर्गत “साहित्य, संस्कार एवं राष्ट्रबोध” विषय पर आधारित दो दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का शुभारंभ 5 मार्च को दोपहर 2.00 बजे महादेवी वर्मा सभागार में हुआ।

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में उपस्थित पूर्व सांसद, साहित्यकार एवं कवि श्री आलोक संजर ने अपने उद्बोधन में कहा कि “साहित्य, संस्कार एवं राष्ट्रबोध” विषय वस्तुतः भारतीय सांस्कृतिक चेतना के त्रिवेणी-संगम का प्रतीक है। उन्होंने कहा कि यह विषय गंगा, यमुना और सरस्वती की उस सांस्कृतिक धारा का द्योतक है, जिसमें विविधता के बीच एकता और आध्यात्मिक संवेदना का प्रवाह सतत बना रहता है। उर्दू भाषा के संस्कार इसी व्यापक भारतीय परंपरा से जुड़े हुए हैं। उन्होंने आगे कहा कि उर्दू अकादमी द्वारा चुना गया यह विषय वर्तमान समय में अत्यंत प्रासंगिक है और समाज में सकारात्मक वैचारिक वातावरण निर्माण में सहायक सिद्ध होगा।

दिल्ली से पधारे ख़लील उर रहमान ने “उर्दू भाषा एवं साहित्य के परिप्रेक्ष्य में संस्कार एवं राष्ट्रबोध” विषय पर अपना विचार व्यक्त करते हुए कहा कि उर्दू साहित्य ने मनुष्य के मनुष्य से, मनुष्य के ब्रह्मांड से और व्यक्ति के स्वयं अपने अस्तित्व से संबंधों की अत्यंत सूक्ष्म और सुंदर व्याख्या की है। साहित्यकार जीवन को अपनी कल्पना की ऊँचाई से देखकर उसे अनुभूति की कसौटी पर परखता है और भावों की कुठाली में तपाकर कुंदन सा रूप देता है। उन्होंने कहा कि यहाँ जीवन से आशय किसी एक व्यक्ति का जीवन नहीं, बल्कि वह सतत जीवन है जो ब्रह्मांड के अस्तित्व तक बना रहेगा। उन्होंने यह भी कहा कि आज उर्दू भाषा भौगोलिक सीमाओं से परे पहुँच चुकी है। यूरोप, लंदन, खाड़ी देशों, अमेरिका और कनाडा में भी उर्दू साहित्य सृजित हो रहा है, किंतु जहाँ कहीं भी उर्दू पहुँची है, उसने अपनी हिन्दुस्तानियत और राष्ट्रबोध की भावना को अक्षुण्ण बनाए रखा है।

भोपाल की साहित्यकार एवं शायरा नफ़ीसा सुल्ताना ने अपने आलेख में कहा कि उर्दू साहित्य का दायरा अत्यंत व्यापक है। यह विभिन्न समुदायों के व्यक्तित्व को निखारने, उनके आचरण और नैतिकता को परिष्कृत करने में सहायक सिद्ध हो सकता है। उन्होंने युवा पीढ़ी से आग्रह किया कि वे उर्दू साहित्य का अधिकाधिक अध्ययन करें, क्योंकि कोई भी समाज अपनी संस्कृति, परंपराओं और मूल्यों से कटकर सफल नहीं हो सकता। उन्होंने यह भी कहा कि नए भारत के निर्माण में माता-पिता, शैक्षिक संस्थानों और सोशल मीडिया की साझा भूमिका है। इन माध्यमों से नई पीढ़ी को स्वस्थ सामाजिक मूल्यों और सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा जा सकता है।

कार्यक्रम का सफल संचालन मेहमूद मलिक ने किया। इस अवसर पर विद्यार्थियों एवं शोधार्थियों द्वारा चयनित आलेखों का वाचन भी हुआ। 

अंत में डॉ. नुसरत मेहदी ने सभी अतिथियों एवं श्रोताओं के प्रति आभार व्यक्त किया।

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