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मोपे रंग ने डारो सांवरिया…..

वाद्यों की जुगलबंदी ने सधी हुई लय, ताल और वाद्य संयोजन से वातावरण को भक्तिमय और ऊर्जावान बनाया

जनजातीय संग्रहालय में महिलाओं की सृजनात्मकता का इंद्राणी समारोह का शुभारंभ हुआ

भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय द्वारा 10 से 12 मार्च, 2026 तक महिलाओं की सृजनात्मकता का उत्सव इंद्राणी समारोह का आयोजन किया जा रहा है। सायं 6.30 बजे से आयोजित इस तीन दिवसीय समारोह में 10 मार्च, मंगलवार को  नादलय रंजनी पंच वाद्य- रंजनी वेंकटेश एवं साथी- कर्नाटक, बुन्देली जस गायन सौम्या बुधोलिया एवं साथी- सागर,  चिल्लौरी नृत्य कोरकू जनजातीय- जमुनाबाई एवं साथी- हरदा, महारी नृत्य अभिप्सा दास एवं साथी- ओडिसा, ढोलूकुनिथा नृत्य पुष्पलता एवं साथी- आंध्रप्रदेश द्वारा प्रस्तुति दी गई। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्जवलन इस दौरान मुख्य अतिथि पद्मश्री दुर्गा बाई व्याम उपस्थित रहीं। अगले क्रम में पद्मश्री दुर्गा बाई व्याम का स्वागत एवं  कलाकारों का स्वागत किया गया। स्वागत निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, डॉ धर्मेंद्र पारे द्वारा किया गया।

गतिविधि में नादलय रंजनी पंच वाद्य- रंजनी वेंकटेश एवं साथी- कर्नाटक ने प्रस्तुति का शुभारंभ “अम्मा आनंददायिनी” – राग गंभीरनाट में आधारित ताना वणर्म्, आदि ताल से किया। यह रचना डॉ. एम. बालमुरलीकृष्णा की अनुपम कृति है। प्रस्तुति के आरंभिक चरण में ही कलाकारों ने अपनी सधी हुई लय, ताल और वाद्य संयोजन से वातावरण को भक्तिमय और ऊर्जावान बना दिया। राग गंभीरनाट की गरिमा और ताना वणर्म् की लयात्मकता को पंच वाद्य के सामंजस्यपूर्ण प्रयोग के साथ प्रस्तुत करते हुए कलाकारों ने कर्नाटक संगीत की समृद्ध परंपरा का प्रभावशाली परिचय दिया। इस प्रस्तुति में एम. के. वासवी-घटम वादक, भाग्यलक्ष्मी एम. कृष्णा- मोरिचंग वादन, रंजिनी सिद्धांथी वेंकटेश- मृदंगम वादक, विदूषी सी. वी. श्रुति- वायिलन स्मिता श्रीकिरण -कनार्टक बांसुरी एवं श्रीमती योगवंदना -वीणा वादन ने संगत की। अगले क्रम में बुन्देली जस गायन की प्रस्तुति सुश्री सौम्या बुधोलिया एवं साथी, सागर ने प्रस्तुति दी। उन्होंने मोरी मैया विराजो…, अंगना पधारो महारानी…, मैया खोल भवन के द्वार…, मोपे रंग ने डारो सांवरिया…, केसरिया रंग डारे…, जैसे जस गीत और फाग गीतों की प्रस्तुति दी।

महारी नृत्य, उड़ीसा

महारी  नृत्य ओडिशा का एक प्राचीन, पारंपरिक और अनुष्ठानिक नृत्य है, जो श्रीजगन्नाथ पुरी मंदिर की देवदासियों द्वारा भगवान श्रीजगन्नाथ को समर्पित किया जाता था। यह भावपूर्ण नृत्य है। इस नृत्य में भक्ति, सौंदर्य और भारतीय संस्कृति की गहराई का अद्भुत संगम देखने को मिलता है। इस नृत्य में मुख्य रूप से गीत गोविंद के छंदों पर आधारित होते हैं, जो भगवान श्रीकृष्ण और राधा की प्रेम कहानियों को दर्शाते हैं।

कोरकू जनजातीय चिल्लौरी नृत्य

मध्यप्रदेश में निवासरत कोरकू जनजातीय द्वारा मुख्य रूप से फसल की कटाई – बुवाई,  विवाह और खुशियों के अवसर पर नृत्य किए जाते हैं। चिल्लौरी नृत्य शरद ऋतु की चांदनी रात में कोरकू जनजातीय की बालिकाएं गोलाकार नृत्य करती हैं। जिसे चिल्लौरी कहते हैं। इस नृत्य में गीतों की विषयवस्तु की प्रधानता है। नृत्य में पारम्परिक वाद्यों के साथ समृद्ध सांस्कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है।

ढोलूकुनिथा नृत्य

ढोलूकुनिथा कर्नाटक का एक प्रसिद्ध और ऊर्जा से भरपूर पारंपरिक लोक नृत्य है, जो मुख्य रूप से कुरुबा गौड़ा (चरवाहा) समुदाय के द्वारा किया जाता है। इसमें नर्तक अपनी कमर में एक बड़ा ढोल (ढोलू) बांधकर तेज थाप, करतब और कठिन पद संचालन के साथ प्रदर्शन करते हैं, जो भगवान शिव की पूजा से जुड़ा है।

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