संभावना गतिविधि में नृत्य-नाट्य आल्हा-ऊदल का मंचन
भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि “संभावना” का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 12 अप्रैल, 2026 को श्री चंद्रमाधव बारिक, भोपाल के निर्देशन में नृत्य-नाट्य आल्हा-ऊदल का मंचन किया गया। यह नाट्य पहली बार मंचित किया गया। इस नृत्य-नाट्य का आलेख श्री योगेश त्रिपाठी, रीवा एवं संगीत संयोजन श्री कुलदीप सारवा, दुर्ग द्वारा किया गया है। इस प्रस्तुति को जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी द्वारा तैयार कराया गया है। प्रस्तुति के पूर्व कलाकार का स्वागत निदेशक, जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी डॉ.धर्मेंद्र पारे द्वारा किया गया।



मध्यप्रदेश की किसी भी बोली में लिखा गया यह पहला महाकाव्य है। इससे बुन्देली भाषिक सामर्थ्य और उसकी शब्द संपदा का अनुमान लगाया जा सकता है। एक आख्यान को पूर्ण महिमा एवं प्रतिष्ठा के साथ बुन्देली में अभिव्यक्त करने से यह बुन्देली भाषी क्षेत्र की जीवन संस्कृति और लोक गायिकी बन गई। वर्षा काल में बुन्देलखंड ही नहीं अपितु आस पास के क्षेत्र क्रमशः अवधी, भोजपुरी और ब्रज के अनेक क्षेत्रों में यह आख्यान लोक प्रचलित हैं।
कथा की शुरुआत तब होती है जब आल्हा और ऊदल को अपनी माता देवलदे से यह पता चलता है कि उनके पिता दशराज और चाचा बछराज की माड़ौगढ़ के राजा करिंगा (जंबे) ने छल से हत्या कर दी थी। करिंगा ने उनके पिता का सिर काटकर अपने किले के सिंह द्वार पर लटका दिया था। यह सुनकर दोनों भाई क्रोध और ग्लानि से भर जाते हैं और माड़ौगढ़ पर आक्रमण कर बदला लेने की प्रतिज्ञा करते हैं।
महोबा की सेना ने माड़ौगढ़ की सीमा पर स्थित बबुरी वन में अपना पड़ाव डाला। यहाँ करिंगा की विशाल सेना और महोबा के वीरों के बीच प्रलयकारी युद्ध हुआ। ऊदल ने अपनी असाधारण वीरता का परिचय देते हुए करिंगा के कई सेनापतियों को धूल चटा दी। लोकगाथाओं के अनुसार, इस युद्ध में इतना रक्त बहा कि मैदान लाल हो गया।
यह कथा न केवल वीरता और युद्ध का वर्णन करती है, बल्कि पितृ भक्ति और कुल के सम्मान के लिए किए गए महान त्याग को भी दर्शाती है। इसी जीत के बाद महोबा के इन वीरों का लोहा पूरे उत्तर भारत ने माना। आल्हा और ऊदल माँ शारदा के भक्त हैं। किंवदंतियों के अनुसार, आज भी आल्हा-ऊदल माँ शादरा मंदिर में आरती करते हैं।
आल्हा-ऊदल नृत्य-नाट्य में बुन्देलखण्ड के महान योद्धाओं आल्हा और ऊदल की वीरतापूर्ण कहानियों को नृत्य, गायन और अभिनय के माध्यम से दिखाया गया है। इसमें पारंपरिक वेशभूषा, ओजस्वी एवं पारंपरिक लोक संगीत और युद्ध के दृश्यों (युद्ध नृत्य) का जीवंत प्रदर्शन किया गया है।
मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय़ में हर रविवार आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा।

















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