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कविता

ब्रजेश बडोले

“बेहतर धरा के लिए “
इतना पढ़ाओ बेटी को –
वह कर सके अंतर,
देखने और घूरने में,
वह समझ सके शब्दों के अर्थ
दे सके उत्तर –
शब्दों का शब्दों से
वह दांत ही ना दिखाएं,
दिखा सके आंख भी ।
इतना पढ़ाओ –
वह भांप सके षड्यंत्र,
और शोषण के नए तरीकों को ।
उसके पास केवल देह ही नहीं,
जिसे दिखाना उसका धेय ना हो,
हुनर भी है दिखाने को ।
वह बाजार का हिस्सा भर न रहे,
उसे बताओ
शेविंग क्रीम के विज्ञापन में
उसकी उपस्थिति, जरिया है,
व्यापार में लाभ का ।
इतना पढ़ाओ –
वह खोल सके अपना मन
जाहिर कर सके इच्छा- अनइच्छा ।
वह दौड़े- भागे,
उड़े आसमान में ।
वह चुन सके अपने लिए
व्यापार और प्यार ।
वह बहके नहीं
महके चारों ओर –
ना कटे देह उसकी टुकड़ों में ।
वह पढ़ सके –
पुरुषों की वासना और बना सके,
आवश्यक दूरी ।
इतना पढ़ाओ –
वह जान सके अपना महत्व ।
महज उत्पाद नहीं,
उत्पादक है वह,
उसे पैदा करना है –
ऐसी नस्ल –
जो बना सके इस धरा को,
बेहतर ।
जहां न हो सरहदों की लड़ाई,
पहनावे से न पहचाने जाए
इंसान ।
ना हो रंगों के झगड़े ॥

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