भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि “संभावना” का आयोजन किया जा रहा है, जिसमें 15 मार्च, 2026 को सुश्री प्रिया पाटकर एवं साथी, सागर द्वारा बधाई नृत्य, मायाराम धुर्वे एवं साथी, डिण्डोरी द्वारा गोण्ड जनजातीय गुदुमबाजा नृत्य, सुश्री रीति पाण्डे एवं साथी, रीवा द्वारा बघेली गायन एवं श्री रामबाबू मालवीय एवं साथी, शाजापुर द्वारा कबीर गायन की प्रस्तुति दी गई।


गतिविधि में श्री रामबाबू मालवीय एवं साथी, शाजापुर द्वारा कबीर गायन की प्रस्तुति दी गई। उन्होंने इनका भेद बाबा मेरे अवधु…, यहां भरियो राम रस खासो…, नगर उड़े झंकार म्हारी हेली…, हेली म्हारी मंदिर में कई ढूंढती फिरे…, जैसे कई पदों और भजनों की प्रस्तुति दी। इसके बाद सुश्री रीति पाण्डेय एवं साथी, रीवा द्वारा बघेली गायन में निमिया के पेड़ बड़ा भारी (देवी गीत)…, लक्ष्मण लिहे बांण रामा (गेलहाई)…, महुआ विनय हम ना (चैती)…, बन बोले मोर (नचनहाई)…, गीतों की प्रस्तुति दी।
बधाई नृत्य
बुन्देलखण्ड अंचल में जन्म विवाह और तीज-त्यौहारों पर बधाई नृत्य किया जाता है। मनौती पूरी हो जाने पर देवी-देवताओं के द्वार पर बधाई नृत्य होता है। इस नृत्य में स्त्रियाँ और पुरुष दोनों ही उमंग से भरकर नृत्य करते हैं। बूढ़ी स्त्रियाँ कुटुम्ब में नाती-पोतों के जन्म पर अपने वंश की वृद्घि के हर्ष से भरकर घर के आंगन में बधाई नाचने लगते हैं। नेग-न्यौछावर बांटती हैं। मंच पर जब बधाई नृत्य समूह के रूप में प्रस्तुत होता है, तो इसमें गीत भी गाये जाते हैं। बधाई के नर्तक, चेहरे के उल्लास, पद संचालन, देह की लचक और रंगारंग वेशभूषा से दर्शकों का मन मोह लेते हैं। इस नृत्य में ढपला, टिमकी, रमतूला और बांसुरी आदि वाद्य प्रयुक्त होते हैं।
गोण्ड जनजातीय गुदुमबाजा नृत्य
गुदुमबाजा नृत्य गोण्ड जनजाति की उपजाति ढुलिया का पारम्परिक नृत्य है। समुदाय में गुदुम वाद्य वादन की सुदीर्घ परम्परा है। विशेषकर विवाह एवं अन्य अनुष्ठानिक अवसरों पर इस समुदाय के कलाकारों को मांगलिक वादन के लिए अनिवार्य रूप से आमंत्रित किया जाता है। इस नृत्य में गुदुम, डफ, मंजीरा, टिमकी आदि वाद्यों के साथ शहनाई के माध्यम से गोण्ड कर्मा और सैला गीतों की धुनों पर वादन एवं रंगीन वेश-भूषा और कमर में गुदुम बांधकर लय और ताल के साथ, विभिन्न मुद्राओं में नृत्य किया जाता है।
मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में हर रविवार दोपहर 02 बजे से आयोजित होने वाली इस गतिविधि में मध्यप्रदेश के पांच लोकांचलों एवं सात प्रमुख जनजातियों की बहुविध कला परंपराओं की प्रस्तुति के साथ ही देश के अन्य राज्यों के कलारूपों को देखने समझने का अवसर भी जनसामान्य को प्राप्त होगा।














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