भोपाल। कार्यक्रम की मुख्य अतिथि वरिष्ठ साहित्यकार डॉ बिनय राजाराम जी ने कहा कि,
“भारतीय संस्कृति यात्राओं से गहरे तक जुड़ी है। यात्राएँ बाहरी व आंतरिक दोनों होती हैं। यात्राएँ मनुष्य को सामाजिक बनाती हैं।”
कार्यक्रम के विशिष्ट अतिथि श्री ऋषि कुमार मिश्र, निदेशक मुक्तिबोध सृजन पीठ ने कहा कि,
विशिष्ट अतिथि ऋषिकुमार मिश्र ने अपने उद्बोधन में कहा कि-
“विद्वान का संग व यात्रा समान है। इसलिए मनुष्य को यात्रा करते रहना चाहिए।”
में डॉ. नुसरत मेहदी ने कहा कि “चरैवेति चरैवेति” जीवन और निरंतर गतिशीलता का संदेश है। यात्रा स्वयं लक्ष्य नहीं, बल्कि उद्देश्य की पूर्ति का माध्यम है। उन्होंने कहा कि यात्राएँ मनुष्य को प्रकृति, भारत की विविध संस्कृतियों और गौरवशाली परंपराओं से परिचित कराती हैं।
बीज वक्तव्य देते हुए अखिल भारतीय साहित्य परिषद भोपाल इकाई की महामंत्री श्रीमती सुनीता यादव ने कहा कि
“हम सब सहयात्री हैं उस यात्रा के जो बाहर से अंदर की तरफ और अंदर से बाहर की तरफ की जाती है आज की गोष्ठी समर्पित है वरिष्ठतम गीतकार कीर्ति शेष गोपाल दास नीरज को जो जीवन के बहुमूल्य गीत अपनी लेखनी से समाज को देकर गये हैं।”
– इस अवसर पर सीमा अग्रवाल ने अपनी द्वारका की यात्रा का वर्णन सुनाया।
– उषा चतुर्वेदी ने वटेश्वरनाथ के मंदिर जाने वाली यात्रा का वर्णन सुनाया।
– जवाहर कर्नावट जी ने अपनी विभिन्न देशों की यात्राओं का वर्णन सार अपने उद्बोधन में सुनाया।जिसमें मलेशिया, जापान, त्रिनिदाद आदि।
– श्री अशोक कुमार धमेनिया जी ने यात्रा-वृत्तांत में काशी विश्वनाथ मंदिर की यात्रा का वर्णन सुनाया।
– रितेश दुबे ने पढ़ा कि “यह यात्रा केवल एक कार्ययात्रा नहीं रही; यह आत्मचिंतन का एक मौन निमंत्रण बन गई।
कार्यक्रम का सुंदर संचालन लेखिका व कवयित्री श्रद्धा यादव द्वारा किया गया। परिषद गीत की प्रस्तुति वरिष्ठ साहित्यकार प्रेमचंद गुप्ता जी ने की और सरस्वती वंदना कवि व लेखक श्री राजेश विश्वकर्मा ने दी।कार्यक्रम में चरणजीत सिंह कुकरेजा,श्रीराम माहेश्वरी, अभासाप उपाध्यक्ष पुरुषोत्तम तिवारी एवं अन्य वरिष्ठ साहित्यकार उपस्थित रहे।













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