डॉ. गोपालदास नायक, खंडवा
सुबह की हल्की धूप जब दीवारों से फिसलती हुई आँगन में उतरती थी, तो लगता था जैसे किसी ने घर के भीतर उम्मीद का छोटा-सा दीप जला दिया हो। वह आँगन बहुत बड़ा नहीं था—चारों ओर से दीवारों में घिरा, बीच में थोड़ा-सा खुला आकाश, एक कोने में तुलसी का पौधा, और दूसरी ओर सीमेंट की पुरानी हौज, जिसमें बरसात का पानी ठहर जाता था। पर उस छोटे-से आँगन में इतनी स्मृतियाँ समाई थीं कि पूरा घर उसी के सहारे साँस लेता था। घर के लोग कहते थे—“आँगन छोटा है, पर दिल बड़ा है।” और सच भी यही था।
शारदा को सबसे ज़्यादा सुकून उसी आँगन में मिलता था। सुबह उठकर झाड़ू लगाना, तुलसी को पानी देना, और फिर हौज के किनारे बैठकर चाय पीना—यही उसका दिन शुरू होने का ढंग था। कभी-कभी वह हौज के पानी में अपना चेहरा देखती और मुस्कुरा देती। चेहरे पर उम्र की रेखाएँ उभर आई थीं, आँखों के नीचे हल्की-सी थकान थी, पर मुस्कान अब भी वही थी—संकोची, शांत, और थोड़ी-सी उदास।
यह वही आँगन था जहाँ कभी उसके बच्चे खेला करते थे। नंगे पाँव दौड़ते, मिट्टी से सने हाथों से दीवारों पर लकीरें खींचते, और शाम होते-होते आँगन को हँसी से भर देते। शारदा को आज भी याद था—कैसे उसका छोटा बेटा गेंद को हौज में गिरा देता था और फिर रोने लगता था, और कैसे वह खुद साड़ी समेटकर पानी में उतर जाती थी। वह हँसती थी, बच्चे हँसते थे, और आँगन भी जैसे हँसता था।
समय धीरे-धीरे बदला। बच्चे बड़े हुए। पढ़ाई, नौकरी, शहर—सब कुछ उनके जीवन का हिस्सा बनता चला गया। आँगन वही रहा, पर उसकी आवाज़ें कम होती गईं। अब वह खेल का मैदान नहीं रहा था, बल्कि प्रतीक्षा का स्थान बन गया था। शारदा हर शाम उस आँगन में कुर्सी डालकर बैठ जाती, मानो किसी के लौटने की राह देख रही हो। कभी-कभी पड़ोस की औरतें आ जातीं, दो-चार बातें हो जातीं, पर भीतर का सन्नाटा वैसे का वैसा ही रहता।
शारदा का पति, हरिनारायण, पहले ही दुनिया छोड़ चुका था। उसके जाने के बाद घर और आँगन दोनों सूने हो गए थे। हरिनारायण शाम को आँगन में बैठकर अख़बार पढ़ते थे। कभी किसी खबर पर गुस्सा करते, कभी किसी फोटो पर ठहाका लगाते। अब अख़बार तो आता था, पर पढ़ने वाला नहीं था। शारदा अख़बार को मोड़कर रख देती और सोचती—“किससे बात करूँ?”
मोबाइल फोन घर में था, पर वह शारदा के लिए एक अजनबी चीज़ था। बच्चे फोन पर बात करते, पर वह बातचीत भी जल्दबाज़ी में सिमट जाती। “माँ, अभी मीटिंग है।” “माँ, कल बात करेंगे।” “माँ, सब ठीक है।” सब ठीक—ये दो शब्द शारदा के लिए सबसे भारी थे। वह जानती थी कि सब ठीक नहीं है, पर कहने वाला कोई नहीं था।
आँगन में अब तुलसी का पौधा ही उसका साथी था। वह उससे बातें करती—बिना किसी झिझक के। कभी अपने दुख कहती, कभी बीते दिनों को याद करती। तुलसी के पत्ते हवा में हिलते, जैसे सुन रहे हों। शारदा को लगता—शायद सच में सुन रहे हैं। शायद इस घर में वही एक है, जो अब भी उसे समझता है।
एक दिन शारदा को अचानक सीने में दर्द उठा। वह आँगन में ही बैठी थी। कुर्सी से उठने की कोशिश की, पर पैर काँप गए। उसने दीवार का सहारा लिया और धीरे-धीरे ज़मीन पर बैठ गई। आँगन की मिट्टी ठंडी थी। उसने आँखें बंद कर लीं। उस क्षण उसे अपने बच्चे याद आए—उनकी हँसी, उनका शोर, उनका बचपन। उसने चाहा कि कोई दौड़ता हुआ आए और कहे—“माँ!” पर आँगन में सिर्फ़ सन्नाटा था।
पड़ोस की कमला ने देखा तो घबरा गई। शारदा को अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने कहा—“उम्र का असर है, ज़्यादा चिंता न करें, पर अकेलापन नुकसान कर रहा है।” यह शब्द—अकेलापन—शारदा के कानों में देर तक गूँजता रहा। अस्पताल के कमरे में लेटी शारदा ने खिड़की से बाहर देखा। वहाँ कोई आँगन नहीं था, बस कंक्रीट और शोर था। उसकी आँखें भर आईं।
बच्चे आए। कुछ देर के लिए। उन्होंने डॉक्टर से बात की, दवाइयाँ लीं, और फिर अपने-अपने काम की बातें करने लगे। शारदा उन्हें देखती रही। उसके मन में कोई शिकायत नहीं थी, बस एक सवाल था—“क्या मैं अब भी तुम्हारे जीवन का हिस्सा हूँ?” वह पूछ नहीं पाई। शब्द गले में अटक गए।
घर लौटने पर आँगन उसे और भी सूना लगा। वह आँगन, जो कभी जीवन से भरा था, अब जैसे उसकी पीड़ा को और बढ़ा रहा था। उसने कुर्सी वहीं रखी, जहाँ हरिनारायण बैठते थे। देर तक चुपचाप बैठी रही। शाम का अँधेरा धीरे-धीरे उतर आया। आँगन के ऊपर आकाश में तारे चमकने लगे। शारदा ने एक-एक तारे को गिना—मानो किसी का इंतज़ार कर रही हो।
एक दिन उसके बेटे ने कहा—“माँ, यहाँ अकेली मत रहो। हमारे साथ शहर चलो।” शारदा ने मुस्कुरा कर कहा—“ठीक है।” पर उसके मन में तूफ़ान था। वह जानती थी कि शहर में उसके लिए कोई आँगन नहीं होगा। वहाँ कमरे होंगे, फ्लैट होंगे, पर वह खुला आकाश नहीं होगा, जो हर सुबह उसे आश्वासन देता था।
जाने से पहले शारदा ने आँगन को देर तक देखा। उसने तुलसी को छुआ, हौज के किनारे हाथ फेरा, दीवारों को निहारा। उसे लगा जैसे वह किसी अपने को छोड़कर जा रही हो। उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह फूट-फूट कर रोना चाहती थी, पर आवाज़ बाहर नहीं आई।
शहर का जीवन तेज़ था। यहाँ हर कोई भाग रहा था। शारदा के लिए समय ठहर गया था। बालकनी में खड़े होकर वह नीचे सड़क को देखती। वहाँ गाड़ियाँ थीं, लोग थे, पर कोई उसे नहीं देख रहा था। वह अपने पुराने आँगन को याद करती—उसकी मिट्टी, उसकी खुशबू, उसकी शांति। यहाँ बालकनी में तुलसी का पौधा था, पर वह मिट्टी वाली आत्मीयता नहीं थी।
धीरे-धीरे शारदा का स्वास्थ्य गिरने लगा। बच्चे व्यस्त थे। बहू अपनी दुनिया में थी। कोई जानबूझकर उसे अनदेखा नहीं कर रहा था, पर फिर भी वह अदृश्य थी। रात को सोते समय वह आँखें बंद करती और अपने आँगन की तस्वीर देखती। कभी-कभी उसे लगता—वह वहीं है, सुबह की धूप उसके चेहरे पर पड़ रही है, बच्चे हँस रहे हैं। वह मुस्कुरा देती।
एक रात शारदा को सपना आया। वह अपने आँगन में खड़ी थी। हरिनारायण वहीं बैठे थे, अख़बार हाथ में। बच्चे खेल रहे थे। सब कुछ वैसा ही था, जैसा कभी हुआ करता था। शारदा ने आगे बढ़कर कहा—“मैं लौट आई हूँ।” हरिनारायण मुस्कुराए। तभी उसकी नींद खुल गई। कमरे में अँधेरा था। वह समझ गई—यह सिर्फ़ सपना था।
अगली सुबह शारदा बहुत शांत थी। उसने बहू से कहा—“मुझे अपने घर ले चलो।” बहू चौंकी। बेटे ने कहा—“माँ, वहाँ अकेली रहोगी।” शारदा ने धीरे से कहा—“अकेली तो यहाँ भी हूँ, पर वहाँ मेरा आँगन है।”
कुछ दिनों बाद शारदा अपने पुराने घर लौट आई। घर जर्जर हो चुका था, पर आँगन अब भी वैसा ही था। तुलसी थोड़ी सूख गई थी, हौज में धूल भर गई थी, पर फिर भी वह आँगन शारदा को देखकर जैसे खिल उठा। उसने पहली बार महीनों बाद गहरी साँस ली। उसे लगा—वह अपने आप से मिल आई है।
शारदा ने फिर से आँगन को संवारना शुरू किया। झाड़ू लगाई, तुलसी में पानी डाला, हौज साफ़ की। शाम को कुर्सी पर बैठी। आकाश को देखा। अब भी कोई नहीं था, पर वह सन्नाटा अब उसे चुभता नहीं था। वह जानती थी—उसका आँगन उसके साथ है।
एक शाम अचानक बारिश हुई। बूँदें आँगन में गिरने लगीं। मिट्टी की खुशबू फैल गई। शारदा ने आँखें बंद कर लीं। उसके होंठों पर हल्की-सी मुस्कान थी। शायद दर्द अब भी था, अकेलापन भी था, पर उस प्यारे-से आँगन में उसे अपना अस्तित्व मिल गया था।
कुछ दिनों बाद पड़ोसियों ने देखा—शारदा अब ज़्यादा बाहर नहीं आती। एक सुबह दरवाज़ा खोला गया। शारदा आँगन में कुर्सी पर बैठी थी—आँखें बंद, चेहरा शांत। जैसे गहरी नींद में हो। पर यह नींद अलग थी—अंतिम। उसके चेहरे पर कोई पीड़ा नहीं थी। बस एक सुकून था, जैसे उसने आखिरकार अपना स्थान पा लिया हो।
आँगन में धूप उतर रही थी। तुलसी के पत्ते हवा में हिल रहे थे। हौज का पानी चमक रहा था। वह प्यारा-सा आँगन, जिसने एक स्त्री के जीवन के हर सुख-दुख को देखा था, आज भी वहीं था—मौन, साक्षी, और भीतर से रोता हुआ।












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