भोपाल। मध्य प्रदेश उर्दू अकादमी, संस्कृति परिषद, संस्कृति विभाग के अंतर्गत “उर्दू ड्रामा फ़ेस्टिवल” के तहत दूसरे दिन शाम 7 बजे “जल कुकड़े” का नाट्य मंचन किया गया। ये नाट्य मंचन अदाकार, भोपाल के द्वारा प्रस्तुत किया गया है जिसके लेखक रफ़ी शब्बीर एवं निर्देशक फर्रुख़ शेर ख़ान हैं और संगीत श्रुति धर्मेश द्वारा दिया गया है।
कार्यक्रम के प्रारम्भ में अकादमी की निदेशक डॉ नुसरत मेहदी ने नाटकों में हास्य और व्यंग के बारे में चर्चा करते हुए कहा कि भारतीय नाट्य परंपरा में भी व्यंग्य और हास्य केवल क्षणिक हँसी का साधन नहीं हैं, बल्कि वे मनुष्य और समाज के लिए आत्मावलोकन का माध्यम हैं। नाट्यशास्त्र में भरतमुनि ने हास्य रस को उन प्रमुख रसों में शामिल किया है, जो दर्शक के हृदय में स्वाभाविक आनंद उत्पन्न करते हुए उसे भीतर से परिष्कृत करता है।
इसी पृष्ठभूमि में आज प्रस्तुत किया जाने वाला नाटक “जलकुकड़े” महत्वपूर्ण है। यह नाटक मनुष्य की एक सामान्य प्रवृत्ति, हसरत, ईर्ष्या और जलन, को तीन अलग-अलग तरीक़ों से प्रस्तुत करता है।
इस नाटक का मुख्य उद्देश्य मानव स्वभाव की इस कमज़ोरी को उजागर करना है, जिसे हम ‘ईर्ष्या’ या ‘मत्सर’ कहते हैं। यह दिखाता है कि किस प्रकार मनुष्य दूसरों के जीवन से अपनी तुलना करके स्वयं को दुखी कर लेता है। ‘ईर्ष्या’ वास्तव में मनुष्य की एक प्रमुख दुर्बलता है।
नाटक में विभिन्न पात्रों के माध्यम से प्रस्तुत ‘हास्य’ धीरे-धीरे दर्शकों को आत्मचिंतन की ओर ले जाता है, जो इसकी एक महत्वपूर्ण विशेषता है, मनोरंजन के साथ-साथ ‘हितोपदेश’।
लोकनाट्य परंपरा से समानता के आधार पर यह नाटक अपनी संरचना और प्रस्तुति में भारतीय लोकनाट्य शैलियों जैसे नौटंकी, स्वांग और भवाई की याद दिलाता है।
आधुनिक समाज में प्रतिस्पर्धा, सामाजिक तुलना और मानसिक दबाव बहुत बढ़ गया है। इस संदर्भ में “जलकुकड़े” आज के ‘कम्पैरिजन कल्चर’ को उजागर करता है।
नाटक के मुख्य कलाकारों में मोहम्मद आसिफ़, सुमित मिश्रा, यश तिवारी, मिथुन धूरिया,पीयूष श्रीवास्तव, संजय पंचाक्षरी एवं उसामा आदि शामिल हैं।

















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