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तीन दिवसीय संभावना गतिविधि के समापन दिवस पर लोकांचल के गायन एवं नृत्यों की प्रस्तुति 

भोपाल। मध्यप्रदेश जनजातीय संग्रहालय में नृत्य,गायन एवं वादन पर केंद्रित गतिविधि “संभावना” अंतर्गत 30 दिसंबर, 2025 से 01 जनवरी, 2026 तक प्रतिदिन दोपहर 02 बजे से संयोजन किया गया है। संग्रहालय में आयोजित इस तीन दिवसीय गतिविधि में 01,जनवरी, 2026 को मटकी लोक नृत्य श्री पंकज नामदेव एवं साथी, इंदौर,  बैगा जनजातीय करमा नृत्य  गणेश प्रसाद बैगा  एवं साथी, बालाघाट, गणगौर नृत्य सुश्री अनुजा जोशी एवं साथी, खण्डवा, कालबेलिया नृत्य श्री आपानाथ कालबेलिया एवं साथी, जोधपुर, सौंगीमुखौटा नृत्य श्री विष्णु आनंद एवं साथी, नासिक, भजन गायन सुश्री ममता मिश्रा एवं साथी, नर्मदापुरम् और  बुन्देली लोकगायन  सुश्री सुभांषिता ठाकुर एवं साथी, सागर, चिरजा एवं माण्ड गायन सुश्री अनीता कंवर एवं साथी, उदयपुर द्वारा प्रस्तुति दी गई। गतिविधि की शुरूआत कलाकारों के स्वागत से की गई। कलाकारों का स्वागत जनजातीय लोक कला एवं बोली विकास अकादमी, निदेशक डॉ. धर्मेंद्र पारे द्वारा किया गया। गतिविधि में सुश्री ममता मिश्रा एवं साथी, नर्मदापुरम् द्वारा बघेली भजन एवं लोक गायन की प्रस्तुति दी गई। अगले क्रम में सुश्री सुभांषिता ठाकुर एवं साथी, सागर द्वारा बुन्देली लोकगायन  में गणेश भज, दादरा एवं अन्य गीतों की प्रस्तुति दी गई। इसके बाद सुश्री अनीता कंवर एवं साथी, उदयपुर द्वारा चिरजा एवं माण्ड गायन की प्रस्तुति दी गई।

मटकी लोक नृत्य

मालवा में मटकी नृत्य का अपना अलग परम्परागत स्वरूप है। विभिन्न अवसरों पर मालवा के गाँव की महिलाएँ मटकी नृत्य करती हैं। ढोल या ढोलक को एक खास लय, जो मटकी के नाम से जानी जाती है, उसकी थाप पर महिलाएँ नृत्य करती हैं। प्रारम्भ में एक ही महिला नृत्य करती है, इसे झेला कहते हैं। महिलाएँ अपनी परम्परागत मालवी वेशभूषा में चेहरे पर घूँघट डाले नृत्य करती हैं। नृत्य करने वाली पहले गीत की कड़ी उठाती है, फिर आसपास की महिलाएँ समूह में कड़ी को दोहराती हैं। नृत्य में हाथ और पैरों में संचालन दर्शनीय होता है। नृत्य के केंद्र में ढोल होता है। ढोल पर मटकी नृत्य की मुख्य ताल है। ढोल, किमची और डण्डे से बजाया जाता जाता है। मटकी नृत्य को कहीं-कहीं आड़ा-खड़ा और रजवाड़ी नृत्य भी कहते हैं।

बैगा जनजातीय करमा नृत्य  

बैगा जनजातीय करमा नृत्य नई फसल आने की खुशी में किए जाने वाले इस नृत्य का मुख्य संगीत मांदल वाद्य की थाप होती है, जिस पर अन्य साथी नृत्य करते हैं। बैगा समुदाय में में फसल देवताओं के आगमन का प्रतीक है और कर्म फल मिलने का उदाहरण भी। कर्म पूजा व नृत्य ही करमा नृत्य को पूर्ण करते हैं।

कालबेलिया नृत्य

चकरी नृत्य राजस्थान के हाड़ौती क्षेत्र का एक पारंपरिक नृत्य है, जो तीज-त्योहारों और शादियों में किया जाता है। इसमें महिला नर्तकियां घेरदार लहंगा पहनकर तेज गति से चक्कर (चकरी) लगाती हैं, जिसके साथ ढोलक और मंजीरा बजाया जाता है। यह आकर्षक नृत्य प्रेम और श्रृंगार के गीतों पर किया जाता है।

भवई नृत्य- राजस्थान

भवई नृत्य- राजस्थान का पारंपरिक लोक नृत्य है। नृत्य में मूल रूप से महिलाओं द्वारा संतुलन बनाकर नत्य किया जाता है। जिसमें  नृत्यांगनाएं बर्तनों को संतुलित करती हैं। राजस्थान के कल्बेलिया समुदायों की महिलाओं द्वारा किया जाने वाला यह पारंपरिक लोक नृत्य, इन समुदायों की असाधारण गुणवत्ता और क्षमता से विकसित हुआ है, जो लंबे समय तक सिर पर कई बर्तनों में पानी को लाते थे। इसमें नत्य में ढोलक, झांज, खरताल, सारंगी, हार्मोनियम बजाए जाते हैं। त्योहारों और विवाहों में भी इस नृत्य का प्रदर्शन देखने को मिलता है।

गणगौर नृत्य

गणगौर निमाड़ी जन-जीवन का गीति काव्य है। चैत्र दशमी से चैत्र सुदी तृतीया तक पूरे नौ दिनों तक चलने वाले इस गणगौर उत्सव का ऐसा एक भी कार्य नहीं, जो बिना गीत के हो। गणगौर के रथ सजाये जाते हैं, रथ दौड़ाये जाते हैं। इसी अवसर पर गणगौर नृत्य भी किया जाता है। झालरिया दिये जाते हैं। महिला और पुरूष रनुबाई और धणियर सूर्यदेव के रथों को सिर पर रखकर नाचते हैं। ढोल और थाली वाद्य गणगौर के केन्द्र होते हैं। गणगौर निमाड़ के साथ राजस्थान, गुजरात, मालवा में भी उतना ही लोकप्रिय है। ।

सौंगीमुखौटा नृत्य श्री विष्णु आनंद एवं साथी, नासिक

सौंगी मुखौटा महाराष्ट्र का एक प्रसिद्ध जनजातीय नृत्य है, जो नरसिंह अवतार की पौराणिक कथा पर आधारित है। इस नृत्य में कलाकार नरसिंह, काल भैरव और बेताल जैसे मुखौटे पहनकर नृत्य करते हैं। यह नृत्य असत्य पर सत्य की विजय का प्रतीक है और इसे चैत्र पूर्णिमा पर देवी की पूजा के बाद किया जाता है।

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