संदीप सृजन
भारत का हृदय कहलाने वाला राज्य मध्यप्रदेश अपनी सांस्कृतिक विविधता के लिए प्रसिद्ध है। यहां होली का त्योहार रंगों से सराबोर होने के साथ-साथ क्षेत्रीय परंपराओं, लोककथाओं, आदिवासी रीतियों और ऐतिहासिक प्रभावों से रंगा होता है। जहां मालवा क्षेत्र में रंगपंचमी की धूम रहती है, वहीं बुंदेलखंड में राम राजा दरबार की भक्ति-पूर्ण होली, आदिवासी इलाकों में भगोरिया और जंगल पूजा, और कुछ गांवों में अनोखी रस्में जैसे अंगारों पर चलना या दुख बांटना देखने को मिलता है। होली यहां केवल रंग खेलने का पर्व नहीं, बल्कि सामाजिक एकता, प्रकृति पूजा, भक्ति और सामुदायिक उत्सव का प्रतीक है।
मालवा क्षेत्र, (विशेषकर इंदौर, उज्जैन, देवास, धार, रतलाम आदि) में होली की परंपरा महाराष्ट्र से प्रभावित है। यहां मुख्य फाल्गुन पूर्णिमा के बाद एकम जिसे मराठी में पड़वा कहा जाता है को केवल प्रतिकात्मक ही होती है और पांच दिन बाद रंगपंचमी पर जोर-शोर से मनाई जाती है। इंदौर में होली पांच दिनों तक चलती है, और अंतिम दिन को पंचमी को होली की विशेष गेर निकाली जाती है। यह परंपरा होल्कर राजवंश से जुड़ी है, जिन्होंने मराठी रंगपंचमी की रीत यहां लाई। उज्जैन में भी पंचमी पर नगरपालिका निगम द्वारा गेर की परम्परा शुरु की गई है।
रंगपंचमी पर शहरों और गॉवों में जो गेर निकलती हैं उसमे लोग ढोल-नगाड़ों के साथ सड़कों पर नाचते-गाते घूमते हैं और एक-दूसरे पर गुलाल डालते हुए निकलते हैं। इंदौर की गेर प्रसिद्ध है, जहां हजारों लोग शामिल होते हैं। उज्जैन के महाकाल मंदिर में होलिका दहन के बाद भस्म आरती में हर्बल गुलाल से होली खेली जाती है। भोपाल में भी फूलों की होली लोकप्रिय है, जैसे लखेरापुरा मंदिर में श्रीनाथजी के साथ फूल फाग उत्सव। मालवा में गुजिया, मालपुआ और ठंडाई के साथ उत्सव पूरा होता है। यह क्षेत्रीय होली अधिक सामाजिक और आनंदपूर्ण होती है, जहां पुरानी दुश्मनी भुला दी जाती है।
बुंदेलखंड क्षेत्र (विशेषकर सागर, दमोह, छतरपुर, टीकमगढ़, ओरछा आदि) में होली भक्ति और लोक संगीत से भरी होती है। ओरछा के राम राजा दरबार में होली पांच दिनों तक चलती है, जहां रामलला को रंग लगाया जाता है और दरबार में भजन-कीर्तन होते हैं। यहां होली राजसी अंदाज में मनाई जाती है, महलों में संगीत, नृत्य और रंगों का खेल होता है।
बाघेलखंड क्षेत्र (विशेषकर सतना, रीवा, सीधी) में फाग और नगाड़िया गीत होली की जान होते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में होली से पहले नागाड़िया की थाप पर फाग गाए जाते हैं, जो बसंत और प्रेम की कहानियां बयां करते हैं। सागर में लड्डूमार होली प्रसिद्ध है—लोग एक-दूसरे पर लड्डू फेंकते हैं, जो श्रीकृष्ण की लीला से जुड़ी है। यहां रंग कम, लेकिन मिठाइयों और मस्ती अधिक होती है। बुंदेलखंड में फूल पाटी नृत्य और राई नृत्य जैसे लोक नृत्य भी होली के दौरान होते हैं।
मध्य प्रदेश के आदिवासी बहुल इलाके (झाबुआ, अलीराजपुर, धार, खरगोन, बड़वानी) में होली भगोरिया के रूप में मनाई जाती है। यह फाल्गुन मास में शुरू होता है और युवा लड़के-लड़कियां रंग लगाकर एक-दूसरे को चुनते हैं—यह एक प्रकार का स्वयंवर है। भगोरिया हाट में बाजार लगता है, जहां रंग, नृत्य और प्रेम की शुरुआत होती है। झाबुआ में मन्नत पूरी होने पर लोग जलते अंगारों पर चलते हैं। सतपुड़ा क्षेत्र में आदिवासी होली रात भर चलती है। लोग जंगल में जाते हैं, विशेष पूजा करते हैं और रंग लगाने पर प्रतिबंध होता है। महू के आसपास आदिवासी पांच दिन घर छोड़कर जंगल में रहते हैं, पारंपरिक वेशभूषा में नाचते-गाते हैं। यह होली प्रकृति से जुड़ी होती है, जहां फसल और वर्षा की कामना की जाती है।
मध्य प्रदेश में कई गांवों में होली की अनोखी रस्में हैं। मुरैना के शेखपुर गांव में 500 साल पुरानी परंपरा है, यहॉ महिलाएं सोलह श्रृंगार करके गांव की परिक्रमा करती हैं। विदिशा के सिरोंज में होलिका दहन बंदूक की गोली से किया जाता है—नवाबी दौर की याद में धांय-धांय गोली चलती है।खरगोन के चोली गांव में होली का दिन दुख बांटने का होता है, रंग नहीं खेला जाता, बल्कि दुखी परिवारों के साथ सांत्वना साझा की जाती है। अगले दिन धूमधाम से होली मनाई जाती है। कुछ गांवों में होली नहीं जलती, जैसे सागर के हथखोय में कुलदेवी की वजह से।
आज मध्य प्रदेश में होली प्राकृतिक रंगों की ओर बढ़ रही है। भोपाल, इंदौर और उज्जैन में हर्बल गुलाल का इस्तेमाल बढ़ा है। मुख्यमंत्री और सार्वजनिक कार्यक्रमों में फूलों की होली खेली जाती है। राज्य पर्यटन विभाग होली को सांस्कृतिक पर्यटन का माध्यम बना रहा है, जहां ओरछा, उज्जैन और भगोरिया जैसे स्थल पर्यटकों को आकर्षित करते हैं। मध्य प्रदेश की होली विविधता का जीवंत उदाहरण है। मालवा की रंगपंचमी से बुंदेलखंड की भक्ति, आदिवासी भगोरिया से अनोखी रस्में सब मिलकर एक रंगीन तस्वीर बनाते हैं। यह त्योहार सिखाता है कि रंग अलग-अलग हो सकते हैं, लेकिन भाव एक प्रेम, एकता और उल्लास। मध्य प्रदेश की होली दिल को रंगने वाली, संस्कृति को संजोने वाली और यादों को ताजा करने वाली होती है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार है)
संपादक- शाश्वत सृजन
ए-99 वी.डी़ मार्केट, उज्जैन 456006
मो.9406649733
मेल- sandipsrijan.ujjain@gmail.com

















Leave a Reply