महेश अग्रवाल
दृष्टि केवल आँखों से नहीं, चेतना से होती है* योग गुरु महेश अग्रवाल नें बताया कि मनुष्य जीवन में दृष्टि का विशेष महत्त्व है, परंतु उससे भी अधिक महत्त्वपूर्ण है दृष्टिकोण। आँखें प्रकाश को ग्रहण करती हैं, किंतु चेतना सत्य को पहचानती है। संसार में करोड़ों लोग ऐसे हैं जिनकी आँखें प्रकाश नहीं देख पातीं, पर उनका अंतर्मन, बुद्धि और आत्मबल पूर्ण प्रकाश से भरा होता है। ऐसे ही लोगों के जीवन में ब्रेल लिपि एक सेतु बनकर आती है – ज्ञान, शिक्षा, आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का सेतु। विश्व ब्रेल दिवस, जो प्रत्येक वर्ष 4 जनवरी को मनाया जाता है, केवल एक तिथि नहीं है, बल्कि यह मानवीय करुणा, समावेशी सोच और सामाजिक उत्तरदायित्व का स्मरण दिवस है। यह दिन हमें यह सोचने के लिए प्रेरित करता है कि क्या हमारा समाज वास्तव में समान अवसर देने वाला समाज बन पाया है?
*ब्रेल लिपि के जनक – लुई ब्रेल अंधकार में प्रकाश की ज्योति* ब्रेल लिपि के जनक लुई ब्रेल का जन्म 4 जनवरी 1809 को फ्रांस में हुआ था। बाल्यावस्था में एक दुर्घटना के कारण उन्होंने अपनी दृष्टि खो दी। परंतु यह दृष्टिहीनता उनके लिए कमजोरी नहीं, बल्कि नव-सृजन की प्रेरणा बनी। उन्होंने अनुभव किया कि यदि दृष्टिबाधित व्यक्ति पढ़-लिख नहीं सकते, तो उनका बौद्धिक और सामाजिक विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसी पीड़ा और संकल्प से जन्म हुआ ब्रेल लिपि का – एक ऐसी स्पर्श आधारित लिपि, जिसने दृष्टिहीन व्यक्तियों को ज्ञान की स्वतंत्रता प्रदान की। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि लुई ब्रेल ने अक्षर नहीं बनाए, उन्होंने आत्मसम्मान गढ़ा।
*ब्रेल लिपि क्या है? – स्पर्श से संवाद की दिव्य कला* ब्रेल लिपि छह बिंदुओं (डॉट्स) पर आधारित एक स्पर्शात्मक लिपि है। इन बिंदुओं के विभिन्न संयोजन से अक्षर, शब्द, संख्याएँ, गणितीय चिह्न और संगीत की लिपि तक बनाई जाती है। ब्रेल लिपि केवल पढ़ने-लिखने का साधन नहीं है, बल्कि यह – आत्मनिर्भरता का आधार, शिक्षा का प्रवेश द्वार, रोजगार की संभावना, आत्मविश्वास की नींव, सामाजिक समावेशन का माध्यम है। जैसे योग में स्पर्श, श्वास और चेतना का समन्वय होता है, वैसे ही ब्रेल में उँगलियों का स्पर्श और मस्तिष्क की सजगता मिलकर ज्ञान को प्रकट करती है।
योग गुरु अग्रवाल नें बताया कि लिपि का अर्थ केवल अक्षरों का क्रम नहीं, बल्कि विचारों, भावनाओं और ज्ञान को सुरक्षित रखने की मानवीय व्यवस्था है। जब वाणी क्षणभंगुर होती है, तब लिपि उसे स्थायित्व प्रदान करती है। लिपि ही वह माध्यम है, जिसके द्वारा एक पीढ़ी का अनुभव दूसरी पीढ़ी तक पहुँचता है। धर्म, दर्शन, योग, विज्ञान और संस्कृति – इन सभी की निरंतरता लिपि के कारण ही संभव हो पाती है। लिपि मनुष्य की चेतना को शब्दों में बाँधकर समाज की सामूहिक स्मृति बनाती है। चाहे देवनागरी हो, रोमन हो या ब्रेल – हर लिपि का मूल उद्देश्य एक ही है – ज्ञान को सीमाओं से मुक्त करना और मानवता को जोड़ना। इसलिए कहा जा सकता है कि लिपि केवल लिखने का साधन नहीं, बल्कि सभ्यता की आत्मा और संस्कारों की वाहक है।
*ब्रेल लिपि लिपि के वास्तविक अर्थ और उद्देश्य को सबसे गहराई से प्रकट करती है।* जहाँ सामान्य लिपियाँ आँखों से पढ़ी जाती हैं, वहीं ब्रेल उँगलियों के स्पर्श से चेतना को जाग्रत करती है। यह सिद्ध करती है कि ज्ञान देखने की वस्तु नहीं, अनुभव करने की प्रक्रिया है। ब्रेल लिपि दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए केवल अक्षरों का समूह नहीं, बल्कि शिक्षा, आत्मनिर्भरता और सम्मानपूर्वक जीवन का आधार है। यह लिपि समाज को यह सिखाती है कि शारीरिक सीमा ज्ञान की सीमा नहीं होती। ब्रेल के माध्यम से विचारों का प्रवाह रुकता नहीं, बल्कि नए मार्गों से आगे बढ़ता है। इसलिए ब्रेल लिपि मानवीय करुणा, समान अधिकार और समावेशी चेतना की सजीव अभिव्यक्ति है।
*दृष्टिबाधिता – शारीरिक अवस्था या सामाजिक चुनौती?* दृष्टिबाधिता स्वयं में उतनी बड़ी समस्या नहीं है, जितनी समाज की असंवेदनशीलता। अक्सर देखा गया है कि – दृष्टिबाधित व्यक्तियों को दया की दृष्टि से देखा जाता है, उनकी क्षमताओं को कम आँका जाता है, निर्णय उनके स्थान पर दूसरे लेने लगते हैं जबकि सत्य यह है कि दृष्टिबाधित व्यक्ति – उत्कृष्ट शिक्षक, संगीतज्ञ, लेखक, योग प्रशिक्षक, समाजसेवी, प्रशासक बन चुके हैं और निरंतर बन रहे हैं। समस्या आँखों की नहीं, सोच की है।
*ब्रेल और शिक्षा – समान अवसर की आधारशिला* शिक्षा किसी भी समाज की रीढ़ होती है। यदि शिक्षा में समान अवसर नहीं हैं, तो विकास अधूरा रह जाता है। ब्रेल लिपि ने दृष्टिबाधित विद्यार्थियों को – पाठ्यपुस्तकों तक पहुँच, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी, उच्च शिक्षा, तकनीकी ज्ञान, प्रदान किया है। आज ब्रेल में – विज्ञान, गणित, दर्शन, धर्मग्रंथ, योग-शास्त्र, उपनिषद, गीता तक उपलब्ध हैं, जो यह सिद्ध करता है कि आध्यात्मिक ज्ञान पर किसी एक इंद्रिय का अधिकार नहीं।
*ब्रेल और योग-दर्शन – आंतरिक दृष्टि का विज्ञान* योग शास्त्र कहता है – चित्तवृत्ति निरोधः अर्थात जब चित्त की चंचलता शांत होती है, तब सत्य का साक्षात्कार होता है। यह साक्षात्कार आँखों से नहीं, अंतःदृष्टि से होता है। दृष्टिबाधित साधक प्रायः – ध्यान में अधिक गहराई से उतरते हैं, श्वास पर अधिक सजग होते हैं, स्पर्श और ध्वनि के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं यह उन्हें योग और ध्यान के क्षेत्र में विशेष रूप से सक्षम बनाता है।ब्रेल और योग दोनों ही हमें सिखाते हैं कि दृष्टि भीतर की ओर मोड़ो, वहीं सच्चा प्रकाश है।
*धर्म और अध्यात्म में दृष्टिबाधिता की अवधारणा* भारतीय दर्शन में अंधकार और प्रकाश केवल भौतिक नहीं, आध्यात्मिक प्रतीक हैं। अविद्या को अंधकार कहा गया, विद्या को प्रकाश। कई महापुरुषों ने कहा है कि – जिसके पास आँखें हैं, वह भी अंधा हो सकता है, और जिसके पास आँखें नहीं, वह भी दिव्य दृष्टि से युक्त हो सकता है। ब्रेल लिपि इस आध्यात्मिक सत्य का सामाजिक रूप है – ज्ञान सबका अधिकार है।
*ब्रेल और सेवा – कर्मयोग की सजीव अभिव्यक्ति* सेवा केवल दान नहीं, सशक्तिकरण है। दृष्टिबाधित व्यक्तियों के लिए – ब्रेल पुस्तकों की उपलब्धता, सार्वजनिक स्थलों पर ब्रेल संकेत, लिफ्ट, बस, बैंक, अस्पताल में ब्रेल सुविधा, डिजिटल ब्रेल और ऑडियो संसाधन यह सब कर्मयोग के आधुनिक रूप हैं। सेवा वही श्रेष्ठ है, जो व्यक्ति को स्वावलंबी बनाए।
*तकनीक और ब्रेल – भविष्य की दिशा* आज तकनीक ने ब्रेल को नई ऊँचाइयाँ दी हैं – ब्रेल डिस्प्ले, ब्रेल प्रिंटर, स्क्रीन रीडर, मोबाइल – आधारित ब्रेल ऐप्स इनसे दृष्टिबाधित व्यक्ति – नौकरी, बैंकिंग, प्रशासन, ऑनलाइन शिक्षा में सक्रिय भागीदारी कर रहे हैं। यह डिजिटल समरसता का युग है।
*विश्व ब्रेल दिवस का वास्तविक संदेश* विश्व ब्रेल दिवस केवल औपचारिक आयोजन का दिन नहीं, बल्कि आत्ममंथन का अवसर है – क्या हम अपने घर, संस्था, आश्रम, योग केन्द्र में ब्रेल का स्थान बना पाए हैं? क्या हम दृष्टिबाधित व्यक्ति को सक्षम नागरिक मानते हैं? क्या हमारी भाषा में संवेदना है? यदि नहीं, तो यह दिवस हमें बदलने का आह्वान करता है।
*समाज के लिए आह्वान – समावेशी चेतना की साधना*
एक योग गुरु होने के नाते मेरा दृढ़ विश्वास है कि जब तक समाज के अंतिम व्यक्ति को साथ लेकर नहीं चला जाएगा, तब तक साधना अधूरी है।
*ब्रेल दिवस हमें सिखाता है – दया नहीं, सम्मान दें, सहानुभूति नहीं, सहयोग दें, अलगाव नहीं, समावेशन करें।*
*ब्रेल – मानवता की लिपि* ब्रेल लिपि केवल छह बिंदुओं का संयोजन नहीं है, यह मानव गरिमा, समानता और आत्मनिर्भरता का शास्त्र है। जिस समाज में ब्रेल का सम्मान है, वहाँ संवेदना जीवित है। विश्व ब्रेल दिवस पर हमारा संकल्प हो – हम ऐसा समाज बनाएँगे जहाँ कोई भी अंधकार में अकेला न रहे, और ज्ञान का प्रकाश हर उँगली के स्पर्श तक पहुँचे।

















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