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भारत में गणतंत्र की ढाई हजार वर्ष पुरानी परंपरा

संदीप सृजन

आधुनिक भारत ने 26 जनवरी 1950 को गणतंत्र व्यवस्था को स्वीकार कर अपने नीति नियम का लिखित कानून संविधान के रूप में लागू किया, लेकिन भारत को दुनिया की सबसे पुरानी सभ्यताओं में से एक माना जाता है, और इसका राजनीतिक इतिहास भी उतना ही समृद्धता और विविधता लिए हुए है। भारत में गणतंत्र की अवधारणा ढाई हजार वर्ष से अधिक पुरानी है। यह दावा केवल एक कथन नहीं, बल्कि ऐतिहासिक साक्ष्यों पर आधारित है, जो प्राचीन वैदिक काल से लेकर महाजनपद युग तक फैला हुआ है। गणतंत्र, या रिपब्लिक, का अर्थ है ऐसी शासन व्यवस्था जहां सत्ता जनता के प्रतिनिधियों या सामूहिक निर्णय पर आधारित होती है, न कि किसी एक राजा या वंशानुगत शासक पर। भले ही आधुनिक भारत 1950 में गणतंत्रीय बना, लेकिन इसकी जड़ें प्राचीन भारत के गणसंघों में गहरी पैठी हुई हैं। 

भारत में गणतंत्र का इतिहास लगभग 600 ईसा पूर्व से शुरू होता है, जब उत्तरी भारत में कई गणराज्य फल-फूल रहे थे। इनमें शाक्य, लिच्छिवी, मल्ल और वज्जी जैसे गणराज्य शामिल थे, जहां निर्णय सामूहिक सभाओं में लिए जाते थे। यह परंपरा वैदिक काल की सभा और समिति से प्रेरित थी, और बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में इसका विस्तृत वर्णन मिलता है। भारत का इतिहास वैदिक काल से शुरू होता है, इस काल में समाज में मुख्य रूप से शासन व्यवस्था में सभा और समिति जैसी संस्थाएं महत्वपूर्ण भूमिका निभाती थीं। ऋग्वेद, सबसे प्राचीन वैदिक ग्रंथ, में सभा का उल्लेख है जहां जनता के प्रतिनिधि मिलकर निर्णय लेते थे। सभा एक प्रकार की लोक सभा थी, जहां योद्धा, पुरोहित और आम लोग शामिल होते थे, जबकि समिति अधिक औपचारिक थी और राजा को सलाह देती थी। यह व्यवस्था पूर्ण रूप से गणतांत्रिक नहीं थी, क्योंकि राजा अभी भी प्रमुख होता था, लेकिन वह निरंकुश नहीं था। राजा का चयन कभी-कभी चुनाव से होता था, और सभा उसके निर्णयों को प्रभावित कर सकती थी। इतिहासकार रोमिला थापर के अनुसार, वैदिक काल में ये संस्थाएं प्रारंभिक लोकतांत्रिक तत्वों का संकेत देती हैं। इस काल में गण और संघ की अवधारणा विकसित हुई, जो बाद में पूर्ण गणराज्यों का आधार बनी। उदाहरण के लिए, कुरु और पांचाल जैसे जनपदों में राजा के साथ-साथ सामूहिक शासन के प्रमाण मिलते हैं। 

वैदिक काल के अंत तक, लगभग 600 ईसा पूर्व, उत्तरी भारत में 16 महाजनपद उभरे, जिनमें से कई गणतंत्र थे। जो बताते है कि गणतंत्र की परंपरा ढाई हजार वर्ष पुरानी है। महाजनपद काल (600-300 ईसा पूर्व) भारत में गणतंत्र के इतिहास का सबसे महत्वपूर्ण अध्याय है। इस युग में गंगा घाटी और उत्तर-पश्चिमी भारत में 16 बड़े राज्य थे, जिन्हें महाजनपद कहा जाता था। इनमें से कुछ राजतंत्र थे, जैसे मगध और कोसल, लेकिन कई गणराज्य थे, जहां शासन कुलीनों या जनता के प्रतिनिधियों द्वारा चलाया जाता था। इन गणराज्यों को गणसंघ या गणराज्य कहा जाता था, और इनमें निर्णय सभा में बहुमत से लिए जाते थे। जैसे शाक्य गणराज्य, जहां गौतम बुद्ध का जन्म हुआ, एक प्रमुख गणराज्य था। यहां शासन सभा द्वारा होता था, जिसमें कुलीन परिवारों के प्रतिनिधि शामिल होते थे। इसी प्रकार, लिच्छिवी गणराज्य (वज्जी संघ का हिस्सा) में राजकुमारों की सभा थी, जो निर्णय लेती थी। बौद्ध ग्रंथों जैसे ‘महापरिनिब्बान सुत्त’ में इन सभाओं का वर्णन है, जहां चर्चा, बहस और मतदान के माध्यम से नीतियां बनाई जाती थीं। जैन ग्रंथों में भी मल्ल और कोलिया जैसे गणराज्यों का उल्लेख है। ये गणराज्य मुख्य रूप से पहाड़ी या सीमावर्ती क्षेत्रों में स्थित थे, जहां केंद्रीकृत राजतंत्र स्थापित करना कठिन था। इतिहासकारों के अनुसार, ये गणराज्य लोकतांत्रिक थे, क्योंकि वे कुलीनों के संघ पर आधारित थे, न कि वंशानुगत राजा पर। हालांकि, ये पूर्ण लोकतांत्रिक नहीं थे, क्योंकि मताधिकार सीमित था, मुख्य रूप से योद्धा वर्ग या कुलीनों तक। फिर भी, ये प्राचीन विश्व में भूमध्यसागरीय गणराज्यों के समानांतर थे।

मौर्य साम्राज्य (321-185 ईसा पूर्व) भारत का पहला बड़ा साम्राज्य था, जिसकी स्थापना चंद्रगुप्त मौर्य ने की। यह राजतंत्र था, लेकिन गणतंत्र की परंपरा का प्रभाव स्पष्ट था। कौटिल्य के ‘अर्थशास्त्र’ में गणसंघों का उल्लेख है, और यह सलाह दी गई है कि राजा को इनसे सतर्क रहना चाहिए। अशोक के शिलालेखों में भी प्रजा की भागीदारी का महत्व बताया गया है। मौर्य काल के बाद, शुंग और कुषाण जैसे साम्राज्यों में गणतंत्र की छाप दिखती है। समुद्रगुप्त के इलाहाबाद स्तंभ लेख में गणराज्यों का उल्लेख है, गुप्त काल को भारत का स्वर्ण युग कहा जाता है, जहां विकेंद्रीकृत शासन था, और स्थानीय सभाएं निर्णय लेती थीं। मध्यकाल में भारत में कई क्षेत्रीय राज्य उभरे, जैसे चोल, पल्लव और चालुक्य। दक्षिण भारत में उथिरमेरुर जैसे गांवों में स्थानीय सभाएं थीं, जहां चुनाव से प्रतिनिधि चुने जाते थे। यह प्राचीन गणतंत्र की निरंतरता दर्शाता है। मुस्लिम आक्रमणों के बाद, दिल्ली सल्तनत और मुगल साम्राज्य में केंद्रीकृत शासन था, लेकिन ग्रामीण स्तर पर पंचायतें गणतांत्रिक थीं। विजयनगर साम्राज्य में भी स्थानीय संघों का महत्व था। हालांकि, इस काल में गणतंत्र कमजोर हुए, लेकिन वे पूरी तरह समाप्त नहीं हुए।

औपनिवेशिक काल में ब्रिटिश शासन ने भारत को एकजुट किया, लेकिन स्वतंत्रता संग्राम में गणतंत्र की मांग प्रमुख थी जो प्राचीन गणराज्यों से प्रेरित थी। 1947 में स्वतंत्रता मिली, लेकिन 1950 में संविधान लागू होने के साथ भारत गणतंत्र बना। डॉ. अंबेडकर की अध्यक्षता में 299 सदस्यों वाली संविधान सभा ने सामूहिक बौद्धिक मंथन करके आधुनिक भारत का संविधान तैयार किया। आज का भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, जहां चुनाव, संसद और न्यायपालिका गणतंत्र की आधारशिला हैं। प्राचीन गणसंघों की विरासत आज भी जीवित है, जैसे पंचायती राज में। भारत में गणतंत्र का इतिहास वास्तव में ढाई हजार वर्ष पुराना है, जो वैदिक सभाओं से शुरू होकर आधुनिक लोकतंत्र तक फैला है। यह इतिहास हमें सिखाता है कि लोकतंत्र कोई आयातित अवधारणा नहीं, बल्कि हमारी अपनी मिट्टी से उपजी है। हालांकि चुनौतियां हैं, जैसे असमानता और भ्रष्टाचार, लेकिन प्राचीन परंपरा हमें मजबूत बनाती है। इस विरासत को संरक्षित रखना हमारा दायित्व है।

लेखक के ये अपने विचार हैं।

(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार है)

संपादक- शाश्वत सृजन

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