संदीप सृजन
हिंदी भाषा, जो विश्व की चौथी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है और भारत की आधिकारिक भाषा है, अब कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) की दुनिया में एक नई क्रांति का केंद्र बिंदु बन रही है। एआई तकनीक ने हिंदी को डिजिटल युग में नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया है, जहां भाषाई बाधाएं ध्वस्त हो रही हैं और समावेशी विकास की नई संभावनाएं खुल रही हैं। हिंदी भाषा और एआई तकनीक का यह संगम न केवल भारत की बहुभाषी विविधता को मजबूत कर रहा है, बल्कि वैश्विक स्तर पर हिंदी को विज्ञान, शिक्षा और शासन की भाषा बनाने में योगदान दे रहा है।
हिंदी भाषा का एआई से जुड़ाव नया नहीं है, लेकिन हाल के वर्षों में यह तेजी से बढ़ा है। भारत में 22 अनुसूचित भाषाओं और सैकड़ों बोलियों के साथ भाषाई विविधता एक बड़ी चुनौती रही है। एआई की प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी) तकनीक ने इस विविधता को अवसर में बदल दिया है। भारत सरकार की प्रमुख पहल भाषिणी इस दिशा में मील का पत्थर है। राष्ट्रीय भाषा अनुवाद मिशन (एनएलटीएम) के तहत विकसित भाषिणी एक एआई-संचालित प्लेटफॉर्म है जो रीयल-टाइम अनुवाद, वाक् पहचान और भाषा समझ प्रदान करता है। यह 22 अनुसूचित भाषाओं सहित जनजातीय भाषाओं का समर्थन करता है। 2025 में भाषिणी ने महाकुंभ जैसे बड़े आयोजनों में बहुभाषी चैटबॉट के रूप में काम किया, जहां लाखों श्रद्धालुओं को हिंदी और अन्य भाषाओं में जानकारी मिली। भारतीय रेलवे ने भी भाषिणी को टिकटिंग और घोषणाओं में एकीकृत किया है, जिससे यात्रियों को अपनी भाषा में सुविधा मिल रही है।
एक और महत्वपूर्ण विकास भारतजेन है। यह भारत का पहला स्वदेशी बहुभाषी जनरेटिव एआई मॉडल है, जो टेक्स्ट-टू-टेक्स्ट और टेक्स्ट-टू-स्पीच क्षमताओं से युक्त है। वर्तमान में यह हिंदी, मराठी, तमिल, मलयालम, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, तेलुगु और कन्नड़ जैसी 9 भाषाओं का समर्थन करता है। जून 2026 तक यह सभी 22 अनुसूचित भाषाओं को कवर करेगा। भारतजेन कृषि, शासन, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में अनुप्रयोग विकसित कर रहा है। उदाहरणस्वरूप, किसानों को हिंदी में मौसम और फसल सलाह मिल सकेगी। यह मॉडल भारतीय संदर्भों और संस्कृति को ध्यान में रखकर बनाया गया है, जो पश्चिमी एआई मॉडलों से अलग है।
वैश्विक स्तर पर भी हिंदी के लिए विशेष एआई मॉडल विकसित हो रहे हैं। जी42 कंपनी का नंदा मॉडल एक 13 अरब पैरामीटर वाला हिंदी-केंद्रित लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) है, जो 2.13 ट्रिलियन टोकनों पर प्रशिक्षित है। यह हिंदी की बोलियों, मुहावरों और क्षेत्रीय विविधताओं को समझता है। नंदा का अपग्रेडेड वर्जन 87 अरब पैरामीटर वाला है, जो हिंदी-अंग्रेजी मिश्रित भाषा (हिंग्लिश) को भी संभालता है। सरवम एआई का ओपनहाथी हिंदी मॉडल और गूगल का जेमिनी अब हिंदी सहित 9 भारतीय भाषाओं में उपलब्ध है। गूगल सर्च का एआई मोड भी हिंदी में काम करता है, जो बातचीत शैली में खोज को आसान बनाता है।
एआई हिंदी शिक्षा और साहित्य को भी बदल रहा है। टॉकियो एआई जैसे ऐप्स हिंदी सीखने में मदद कर रहे हैं, जबकि आईआईटी मद्रास ने लेक्चरों को 11 भारतीय भाषाओं में अनुवाद करने वाला सिस्टम विकसित किया है। बॉलीवुड और सोशल मीडिया पर हिंदी कंटेंट को एआई टूल्स से बेहतर बनाया जा रहा है। पर्यावरण, स्वास्थ्य और लिंग समानता जैसे विषयों पर हिंदी पॉडकास्ट और ब्लॉग एआई की मदद से वैश्विक पहुंच बना रहे हैं।
हालांकि, हिंदी और एआई के इस सफर में चुनौतियां भी हैं। मुख्य समस्या डेटा की कमी है। इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री का बड़ा हिस्सा अंग्रेजी में है, जबकि भारतीय भाषाएं मात्र 1 प्रतिशत हैं। हिंदी की जटिल व्याकरण, संयुक्त शब्द, लिपि (देवनागरी) और बोलियों की विविधता एआई मॉडलों के लिए टोकनाइजेशन और प्रशिक्षण को कठिन बनाती है। हिंग्लिश और कोड-स्विचिंग (भाषा मिश्रण) भी समस्या पैदा करती है। कई साहित्यिक और मौखिक परंपराएं डिजिटाइज नहीं हुई हैं। इसके अलावा, बायस का खतरा है – यदि प्रशिक्षण डेटा असंतुलित हो तो एआई सांस्कृतिक गलतियां कर सकता है। गोपनीयता और डेटा सुरक्षा भी चिंता का विषय है। कम संसाधन वाली भाषाओं में एआई की सटीकता कम होती है, जिससे अनुवाद में अर्थ विकृति हो सकती है।
इन चुनौतियों के बावजूद, भविष्य उज्ज्वल है। भारत सरकार की इंडिया एआई मिशन और ओपन-सोर्स पहलें डेटा संग्रह को बढ़ावा दे रही हैं। भाषिणी की क्राउडसोर्सिंग से लाखों वाक्य एकत्र हो रहे हैं। 2026 तक भारतजेन सभी भाषाओं को कवर करेगा, जो डिजिटल समावेशिता को बढ़ाएगा। एआई हिंदी को विज्ञान और तकनीक की भाषा बना रहा है, जैसा कि केंद्रीय मंत्री डॉ. जितेंद्र सिंह ने कहा – “हिंदी अब सिर्फ भाषा नहीं, भारत की सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक है।” एआई से हिंदी में रोजगार के नए अवसर खुल रहे हैं, जैसे अनुवादक, कंटेंट क्रिएटर और एआई ट्रेनर।
हिंदी भाषा और एआई तकनीक का यह मिलन भारत को वैश्विक एआई नेता बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। यह न केवल भाषाई बाधाओं को तोड़ रहा है, बल्कि करोड़ों लोगों को डिजिटल दुनिया से जोड़ रहा है। यदि हम डेटा संग्रह, नैतिकता और समावेश पर ध्यान दें, तो हिंदी एआई के माध्यम से विश्व को नई वैचारिक दृष्टि दे सकती है। यह संगम हमें एक ऐसे भारत की ओर ले जा रहा है जहां हर नागरिक अपनी मातृभाषा में प्रौद्योगिकी का लाभ उठा सके। हिंदी और एआई का यह सफर अभी शुरुआत है – आगे और भी क्रांति बाकी है।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तम्भकार है)
संपादक- शाश्वत सृजन
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लेखक के ये अपने विचार हैं।

















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