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सपनों का बोझ और टूटती सांसें: क्यों बढ़ रही है छात्र आत्महत्या?

डॉ. योगिता सिंह राठौड़

आज का विद्यार्थी सपनों को लेकर जितना उत्साहित दिखाई देता है, उतना ही दबाव और चिंता का बोझ भी उसके कंधों पर निरंतर बढ़ता जा रहा है। शिक्षा का उद्देश्य जहाँ ज्ञान, आत्मविश्वास और व्यक्तित्व विकास होना चाहिए, वहीं प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ ने इसे तनाव, भय और अनिश्चितताओं का केंद्र बना दिया है। बीते कुछ वर्षों में विद्यार्थियों में आत्महत्या की बढ़ती घटनाएँ न केवल चिंताजनक हैं, बल्कि हमारे पूरे सामाजिक, पारिवारिक और शैक्षणिक ढाँचे पर सवाल खड़ा करती हैं। आखिर वह कौन-सी परिस्थितियाँ हैं जो जीवन की शुरुआत में खड़ा एक युवा मन अपने ही सपनों के बोझ तले दबकर टूट जाता है?

सबसे बड़ा कारण है अत्यधिक अपेक्षाएँ— चाहे वह माता-पिता की हों, समाज की हों या स्वयं विद्यार्थी की। माता-पिता अक्सर अपने बच्चों में वह भविष्य देखना चाहते हैं, जो वे स्वयं जी नहीं पाए। डॉक्टर, इंजीनियर, प्रशासनिक अधिकारी बनकर ही मानो सफलता की परिभाषा पूरी होती है। ऐसे में बच्चा अपने व्यक्तिगत रुचियों और क्षमताओं को पीछे छोड़कर उस लक्ष्य को अपनाने के लिए मजबूर हो जाता है, जो उसका अपना नहीं होता। धीरे-धीरे यह अपेक्षाएँ तनाव में बदल जाती हैं और असफलता का भय उसे भीतर ही भीतर तोड़ने लगता है।

दूसरा कारण है शैक्षणिक प्रतिस्पर्धा का अस्वस्थ वातावरण। कोचिंग संस्थान, परीक्षा पैटर्न, रैंकिंग प्रणाली और लगातार बेहतर प्रदर्शन का दबाव विद्यार्थियों को इस हद तक थका देता है कि वे मानसिक रूप से असंतुलित होने लगते हैं। कई बार छात्र अपने साथियों की तुलना में स्वयं को कमजोर महसूस करने लगते हैं, जिससे आत्मग्लानि और हीनभावना बढ़ने लगती है। जब आत्मविश्वास गिरता है, तो यह अवसाद और अंततः आत्महत्या जैसे खतरनाक कदम की ओर ले जा सकता है।

इसके अलावा, मानसिक स्वास्थ्य के प्रति उदासीनता भी एक बड़ी समस्या है। हमारे समाज में मानसिक तनाव को कमजोरी समझा जाता है। ‘सब ठीक हो जाएगा’, ‘थोड़ा मेहनत करो’, ‘दूसरे भी तो कर रहे हैं’ जैसी बातें छात्र की समस्या को समझने की बजाय उसे और अकेला कर देती हैं। स्कूलों और कॉलेजों में काउंसलिंग सुविधाओं का अभाव स्थिति को और गंभीर बना देता है। कई बच्चे अपनी पीड़ा साझा करने में हिचकिचाते हैं क्योंकि उन्हें डर होता है कि कहीं उन्हें गलत न समझ लिया जाए या मज़ाक का विषय न बना दिया जाए।

डिजिटल दुनिया भी इस चुनौती को बढ़ा रही है। सोशल मीडिया पर सफलता के दिखावटी चित्र देखकर छात्र अपने जीवन को कमतर समझने लगते हैं। स्वयं की तुलना दूसरों से करने की प्रवृत्ति उन्हें भीतर से खोखला कर देती है। लाइक्स और फॉलोअर्स की संस्कृति ने आत्मसम्मान को आभासी मानकों से बाँध दिया है, जिसकी मार सबसे अधिक किशोर मन पर पड़ती है।

इन सभी कारणों के बीच सबसे पीड़ादायक सच यह है कि विद्यार्थी अकेला महसूस करता है—घर में, स्कूल में, और अक्सर दोस्तों के बीच भी। उसके मन में उठते सवालों और असुरक्षाओं को कोई गंभीरता से नहीं सुनता। वह चाहता है कि उसे समझा जाए, सुना जाए और जीवन जीने के लिए प्रेरित किया जाए। लेकिन जब उसे संबल नहीं मिलता, तो उसकी सांसें सपनों के बोझ तले दम तोड़ देती हैं।

परंतु यह स्थिति अपरिवर्तनीय नहीं है। समाधान हमारे ही हाथों में है। सबसे पहले, परिवार को संवेदनशील बनना होगा। बच्चों पर अपनी आकांक्षाएँ थोपने के बजाय उनकी रुचियों और क्षमताओं को महत्व देना होगा। संवाद और सहानुभूति ही वह चाबी है जो उनके तनाव के ताले को खोल सकती है।

दूसरा, शैक्षणिक संस्थानों को मनोवैज्ञानिक परामर्श को अनिवार्य बनाना चाहिए। नियमित मानसिक स्वास्थ्य सत्र, तनाव प्रबंधन कार्यशालाएँ और सहज उपलब्ध काउंसलिंग बच्चों को जीवन की चुनौतियों से जूझने में मदद कर सकती है।

तीसरा, सफलता की परिभाषा बदलनी होगी। हर बच्चा अलग है, उसकी क्षमताएँ अलग हैं, उसकी यात्रा अलग है। अंक, रैंक और डिग्री जीवन का अंतिम सत्य नहीं हैं। यदि बच्चे को अपनी गति से आगे बढ़ने दिया जाए, तो वह अधिक आत्मविश्वास, रचनात्मक और संतुलित बन सकता है।

अंत में, समाज को यह समझना होगा कि विद्यार्थी पहले इंसान है, फिर परीक्षार्थी। उसके सपनों को पंख देने की जिम्मेदारी हम सबकी है। यदि हम उसे स्वस्थ वातावरण, भावनात्मक सुरक्षा और समझ का सहारा दें, तो शायद कोई सपना बोझ न बने और कोई सांस टूटने से बच जाए।

छात्र आत्महत्या किसी एक की नहीं, पूरे समाज की हार है। इसे रोकना हमारा सामूहिक उत्तरदायित्व है—ताकि हमारे बच्चे न केवल सपने देखें, बल्कि मुस्कुराते हुए उन्हें जी भी सकें।

प्राचार्य

माँ नर्मदा कॉलेज ऑफ एजुकेशन धामनोद

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